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90 दिन, 160 से ज्यादा मौत… जानिए कैसे 3 महीने से हिंसा की आग में जल रहा है मणिपुर; फिर हुई आगजनी

नई दिल्ली : भारत के पूर्वोत्तर में स्थित मणिपुर देश के खूबसूरत राज्यों में से एक है। यह राज्य उत्तर में नागालैंड और दक्षिण में मिजोरम, पश्चिम में असम, और पूर्व में म्यांमार के साथ अपना बॉर्डर शेयर करता है। नेचुरल ब्यूटी से भरा ये राज्य पिछले तीन महीने से हिंसा की आग में चल रहा है। राज्य में पहली बार 3 मई को हिंसा हुई थी। उसके बाद से हिंसा रूक ही नहीं और आज ठीक 3 महीने बाद भी प्रदेश में शांति बहाल नहीं हो पाई है। आइए जानते है कि ऐसा कौन सा वो फैसला था जिस के कारण आज मणिपुर की हिंसा का दंश झेल रहा है।

मणिपुर में हिंसा की असल वजह जॉब और एजुकेशन में मिलने वाला रिजर्वेशन है। कुकी समुदाय को राज्य में स्पेशल स्टेटस मिला हुआ है। कोई भी व्यक्ति कुकी जनजाति की जमीन को खरीद नहीं सकता है। वहीं, कुकी मैदान में आकर जमीन खरीद सकते हैं बस सकते हैं। लेकिन मैतेई पहाड़ी एरिया में नहीं जा सकते। कुकी समुदाय को प्रीवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट के तहत मजबूत कानूनी कवच भी प्राप्त है। कुकी जनजातियों को होने वाली कमाई इनकम टैक्स फ्री होती है। मणिपुर का 90 फीसदी भू-भाग पहाड़ी है जहां कुकी बसते हैं। बाकी 10 फीसदी भूभाग पर मैतेई और दूसरी जाति बसी है। मैतेई को शेड्यूल ट्राइब का दर्जा नहीं मिले, इसे लेकर विवाद बना हुआ है।

मणिपुर के मैतई समाज के लोग कुकी समुदाय के तर्ज पर खुद के लिए अनुसूचित जनजाति की मांग कर रहे हैं। वहीं, नागा और कुकी का साफ मानना है कि सारी विकास की मलाई मूल निवासी मैतेई ले लेते हैं इसलिए उन्हें ST स्टेटस नहीं मिलना चाहिए। बता दें कि कुकी ज्यादातर म्यांमार से आए हैं। करीब 200 सालों से कुकी को स्टेट का संरक्षण मिला। कई इतिहासकारों का मानना है कि अंग्रेज नागाओं के खिलाफ कुकी को लाए थे। नागा अंग्रेजों पर हमले करते तो उसका बचाव यही कुकी करते थे। बाद में अधिकतर ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया जिसका फायदा मिला और एसटी स्टेटस भी मिला। वहीं, राज्य के मुख्यमंत्री ने मौजूदा हालात के लिए म्यांमार से घुसपैठ और अवैध हथियारों को ही जिम्मेदार ठहराया है।

अब तक क्या-क्या हुआ?

मणिपुर में हिंसा के शुरूआती दिनों में ही केंद्र सरकार एक्टिव हो गई। खुद गृहमंत्री अमित शाह शाह 29 मई को तीन दिन के दौरे पर मणिपुर पहुंचे थे। उनकी यात्रा 2 जून की समाप्त हुई थी। इस दौरान केंद्रीय सुरक्षाबलों को राज्य में तैनात करने के साथ ही सेना को अलर्ट पर रखा गया है। हिंसा की बढ़ती घटनाओं के बीच 24 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई गई।

हिंसा न रोक पाने के लिए मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देने की कोशिश की तो उनके समर्थकों ने उन्हें रोककर उनका इस्तीफा फाड़ दिया, जिसके बाद वह पद पर बने रहें। इसके बाद विपक्षी दल के 21 सांसद भी 29 जुलाई को मणिपुर के दौरे पर पहुंचे। इस दौरान मणिपुर को लेकर 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र हंगामेदार रहा है।

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मणिपुर में 3 मई को पहली बार हुई थी हिंसा

मणिपुर में 3 मई को सबसे पहले जातीय हिंसा की शुरुआत हुई थी. मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल किए जाने की मांग के विरोध में पहाड़ी जिलों में ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ आयोजित किया था। तब पहली बार मणिपुर में जातीय झड़पें हुईं। हिंसा में अब तक 160 से ज्यादा लोगों की जान चली गई और कई सैकड़ों घायल हो गए।

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