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थनैला बीमारी के लिए टीका विकसित करेगा जीएलए, मिला अनुदान

  • पशुओं के स्तन ग्रंथियों की एक सूजन वाली बीमारी है थनैला, डेयरी उद्योग को होता है भारी नुकसान

दैनिक उजाला, मथुरा : जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा के जैव प्रौद्योगिकी विभाग को उत्तर प्रदेश विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिषद से 10 लाख रूपए की एक सरकारी वित्त पोषित परियोजना मिली है। इस परियोजना के अन्तर्गत पशुओं में पाये जाने वाली थनैला बीमारी के लिए नया टीका विकसित किया जायेगा।

थनैला डेयरी पशुओं की स्तन ग्रंथियों की एक सूजन वाली स्थिति है, जो दुनिया भर में डेयरी उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचाती है। अच्छी तरह से विकसित डेयरी उद्योग वाले देशों में थनैला के कारण रुग्णता 40 प्रतिषत तक हो सकती है। खराब दूध देने वाले पशुओं की तुलना में अधिक दूध देने वाले पशु/नस्लें अधिक संवेदनशील होते हैं। थनैला होने के बाद दूध का उत्पादन काफी कम हो जाता है, जिससे सभी थन प्रभावित होते हैं, तो कुछ पशु कुल दूध उत्पादन क्षमता खो देते हैं। थनैला का दूध फट जाता है और उसे फेंकने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। संक्रमित थन हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं और दूध देने वाले पषु जीवन भर के लिए अनुत्पादक हो जाते हैं।

इस परियोजना का नेतृत्व विभाग के डा. स्वरूप कुमार पांडे और दो सह-अन्वेषक डा. अनुजा मिश्रा और डा. जगदीप सिंह सोहल कर रहे हैं। परियोजना के अन्वेषक डा. स्वरूप कुमार पांडे ने बताया कि थनैला (मैस्टाइटिस) के प्रबंधन के लिए टीकों का परीक्षण किया गया है और विकसित देशों में वाणिज्यिक टीके उपलब्ध हैं। भारत में कोई वाणिज्यिक टीका उपलब्ध नहीं है। कुछ दवाएं हैं, लेकिन वह इतनी प्रभावी नहीं जितना होना चाहिए। उनसे लाभ मिलने के दूर-दूर तक कहीं आसार नहीं दिखते। इसके अलावा भारत में किसी आयातित टीके का परीक्षण नहीं किया गया है। इसलिए मैस्टाइटिस वैक्सीन विकसित करने के लिए सिस्टमिक वैक्सीनोलॉजी दृष्टिकोण का उपयोग करने की आवश्यकता है। मैस्टाइटिस के नियंत्रण के लिए जन्मजात प्रतिरक्षा को बढ़ाना और सेल मध्यस्थ प्रतिक्रिया को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. शूरवीर सिंह ने बताया कि स्तन ग्रंथियों में प्रतिरक्षा प्रणाली की जटिलता को देखते हुए, थनैला के लिए टीके विकसित करते समय प्रणालीगत वैक्सीनोलॉजी दृष्टिकोण को लागू करने का प्रस्ताव किया गया है। इस परियोजना में थनैला के खिलाफ बहु-घटकीय टीका विकसित करने के लिए प्रणालीगत वैक्सीनोलॉजी दृष्टिकोण का उपयोग करने का प्रस्ताव है।

डीन रिसर्च प्रो. कमल शर्मा ने पीआई डा. स्वरूप पांडे को बधाई दी और कहा कि सरकार की इसी तरह की परियोजनाएं जीएलए विश्वविद्यालय के शोध को एक नया आयाम प्रदान कर रही हैं। ऐसे ही सरकार द्वारा जारी कई परियोजनाओं पर जीएलए विष्वविद्यालय के प्रोफेसर और छात्र मिलकर कार्य कर रहे हैं।

जीएलए के कुलपति प्रो. फाल्गुनी गुप्ता, प्रतिकुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता और कुलसचिव अशोक कुमार सिंह ने टीम को उनकी उपलब्धि के लिए बधाई दी और भविष्य ऐसे ही प्रयासों के लिए प्रेरित किया।

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