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सांवलिया सेठ मंदिर का चढ़ावा 225 करोड़ पार:30 साल में 340 गुना वृद्धि, भक्त चढ़ाते हैं आमदनी का हिस्सा

चित्तौड़गढ़ : चित्तौड़गढ़ के मंडफिया में स्थित श्री सांवलियाजी मंदिर अब देशभर में आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया है। यहां आने वाले भक्त भगवान को अपना साझेदार मानकर अपनी आय का हिस्सा चढ़ाते हैं। इस श्रद्धा का असर मंदिर के चढ़ावे में साफ दिख रहा है। इस साल वार्षिक चढ़ावा 225 करोड़ रुपए पार कर गया है, जबकि 30 साल पहले यह सिर्फ 65 लाख रुपए था। इस तरह चढ़ावे में 340 गुना से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है।

अब मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या भी लाखों में पहुंच गई है। विशेष अवसरों पर तो एक दिन में 15 लाख से अधिक भक्त दर्शन के लिए आते हैं। चतुर्दशी, अमावस्या और जन्माष्टमी जैसे त्योहारों पर यहां भीड़ उमड़ती है।

देश भर में आस्था का प्रमुख केंद्र - श्री सांवलिया जी मंदिर।

देश भर में आस्था का प्रमुख केंद्र – श्री सांवलिया जी मंदिर।

1991 में पहली बार खोला गया था दान पात्र

श्री सांवलिया जी मंदिर में पहली बार साल 1991 में जब दान पात्र खोला गया था। साल के अंत में यानी 1991-92 में मंदिर को करीब 65.45 लाख रुपए की आय हुई थी। तब से यह सिलसिला लगातार बढ़ता गया। इसके बाद सांवरा सेठ की ख्याति ऐसी फैली कि अगले ही साल 1992-93 में 1.75 करोड़ का कुल चढ़ावा आया। इसी तरह, यह कारवां 2, 3 करोड़ की राशि से बढ़कर साल 2024–25 तक करीब 225 करोड़ रुपए, यानी लगभग ढाई अरब रुपए तक पहुंच गई। यह वृद्धि सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि भगवान सांवलिया सेठ में बढ़ते विश्वास और भक्तों की अटूट आस्था की कहानी भी बयां करती है।

कमाई का एक हिस्सा चढ़ाते है भक्त

यहां आने वाले भक्त भगवान को सिर्फ मन्नतें नहीं मांगते, बल्कि अपनी कमाई का एक हिस्सा ‘सांवरा सेठ’ के नाम पर चढ़ाते हैं। कई तो अपने व्यापार या नौकरी की आमदनी में भगवान को “पार्टनर” बनाकर नियमित रूप से हिस्सा अर्पित करते हैं। कुछ भक्त तो इस पार्टनरशिप को स्टांप पेपर पर लिखकर भी मंदिर को सौंपते हैं।

दान पात्र खुलने के बाद गिनने में लगते है कई दिन

मंदिर में हर महीने अमावस्या से पहले चतुर्दशी के दिन दान पात्र खोले जाते हैं। इसमें इतनी बड़ी मात्रा में चढ़ावा आता है कि पूरा गिनने में कम से कम 5 से 10 दिन का समय लग जाता है। भक्त सिर्फ नकद ही नहीं, बल्कि मनी ऑर्डर, चेक और ऑनलाइन के माध्यमों से भी दान करते हैं। इतना ही नहीं, विदेशी पर्यटक भी आते है और वे फॉरेन करेंसी भी चढ़ा कर जाते है। काउंटिंग के दौरान कई फॉरेन करेंसी भी मिलते है। इसके अलावा सोने-चांदी के गहने, सिक्के, ऐंटीक आइटम्स और आभूषणों के रूप में भी चढ़ावा आता है।

श्रद्धालु ने चढ़ावे में अर्पित किया चांदी का स्कूटर, आकर्षण का बना केंद्र।

श्रद्धालु ने चढ़ावे में अर्पित किया चांदी का स्कूटर, आकर्षण का बना केंद्र।

कोरोना काल के बाद बढ़ी लोकप्रियता

श्री सांवलिया जी मंदिर की ख्याति अब सिर्फ चित्तौड़गढ़ या मेवाड़ तक सीमित नहीं रही। राजस्थान के हर कोने से लेकर देश-विदेश तक के भक्त यहां आकर दर्शन करते हैं। खास अवसरों पर तो मंडफिया और आसपास का पूरा इलाका भक्तिमय माहौल से भर जाता है। कोविड काल के बाद से मंदिर की लोकप्रियता और भी तेजी से बढ़ी है। लोगों का भरोसा और आस्था अब पहले से कहीं ज्यादा गहरी हो चुकी है।

तीन मूर्तियों का चमत्कारिक प्रकट होना, ख्याति मिली मंडफिया के सांवरा सेठ को

माना जाता है कि करीब 250 से 300 साल पहले जब बागुंड का इलाका जंगलों से घिरा था, तब मंडफिया गांव के एक ग्वाला भोलीराम गुर्जर रोज अपनी गायों को चराने वहां जाया करते थे। एक दिन दोपहर में जब वह एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे, तभी उन्हें सपने में भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप श्री सांवलिया सेठ ने दर्शन दिए और कहा – मैं यहीं दबा हुआ हूं, मुझे बाहर निकालो।

भोलीराम ने जब यह बात गांववालों को बताई और खुदाई शुरू की, तो वहां से तीन एक जैसी मूर्तियां निकलीं। ग्रामीणों ने इन मूर्तियों को श्रीकृष्ण का ही रूप माना और उनके श्याम वर्ण के कारण उन्हें ‘सांवलिया सेठ’ नाम दिया गया।

तीनों मूर्तियों में से एक मूर्ति भोलीराम अपने घर मंडफिया लेकर आए और उसे घर के परिंडे (मटकी रखने की जगह, जो अभी सांवरा सेठ की मूर्ति स्थापित है) में स्थापित कर पूजा-पाठ शुरू कर दी। धीरे-धीरे इन तीनों स्थानों पर मंदिर बने, लेकिन मंडफिया स्थित मंदिर की ख्याति सबसे ज्यादा बढ़ी। यही वह स्थान है, जिसे आज श्री सांवलिया जी मंदिर के रूप में जाना जाता है।

भक्तों द्वारा श्री सांवलिया जी को भेंट किया गया स्वर्णाभूषण श्रृंगार सेट।

भक्तों द्वारा श्री सांवलिया जी को भेंट किया गया स्वर्णाभूषण श्रृंगार सेट।

कच्चे मकान से भव्य मंदिर तक सफर

शुरुआत में यह मंदिर एक साधारण कच्चा मकान हुआ करता था। बाद में भक्तों के सहयोग और मंदिर प्रबंधन की मेहनत से इसे पक्का भवन बनाया गया। साल 1958 में यहां मंडफिया पंचायत हुआ करती थी, जिसमें 16 सदस्यों की कार्यकारिणी थी। इसी दौरान मंदिर के लिए एक ट्रस्ट का गठन हुआ। दौलतराम गुर्जर पहले ट्रस्ट अध्यक्ष बने, जबकि उस समय के सरपंच तुलसीदास वैष्णव थे (जो वर्तमान मंदिर मंडल अध्यक्ष हजारीदास वैष्णव और पूर्व अध्यक्ष कन्हैयादास वैष्णव के पिता थे)।

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