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Thu. Feb 12th, 2026

जीएलए के बायोटेक विभाग को मिला बड़ा प्रोजेक्ट, पशुओं के इस रोग के लिए होगा ‘रामबाण’

  • पशुओं की लाइलाज प्रमुख रोग जोन्स बीमारी की रोकथाम हेतु इंजेक्शन टीके की तर्ज पर ‘ओरल टीका‘ बनाने हेतु डीबीटी-बाईरैक द्वारा एक बड़ा प्रोजेक्ट बायोटेक विभाग को दिया गया
  • पहले भी बायोटेक के विभागाध्यक्ष प्रो. शूरवीर एवं उनकी टीम के द्वारा इंजेक्शन के माध्यम से लगने वाला टीका तैयार कर चुके हैं, जो कि एक वंडर टीके की श्रेणी में आता है
  • ओरल टीका भी पशुओं की जाॅन्स डिजीज नामक लाइलाज रोग के उपचार एवं रोकथाम में मिल का पत्थर साबित होगा

दैनिक उजाला, मथुरा : एक के बाद एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा के बायोटेक विभाग ने जोहन्स रोग पर शोध में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छाप छोड़ी है। विभाग की इन्हीं उपलब्धियों को मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार के डीबीटी-बाईरैक स्कीम के माध्यम से एक नया प्रोजेक्ट मिला है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से जीएलए का बायोटेक विभाग पशुओं में उत्पन्न होने वाली जाॅन्स बीमारी से बचाव व उपचार के लिए ‘ओरल वैक्सीन‘ यानि ‘मौखिक टीका‘ तैयार करेगा।

विदित रहे कि घरेलू पशुओं की पैराट्यूबरकुलोसिस (पीटीबी) नामक अत्यधिक व्यापक संक्रामक बीमारी के खिलाफ ‘ओरल वैक्सीन‘ विकसित करने के लिए यह परियोजना दी गई है। रोग को जॉन्स रोग (जेडी) के रूप में भी जाना जाता है, यह गाय, भैंस, बकरी, भेड़, ऊंट, याक आदि की एक लाइलाज बीमारी है। यह पाचन और प्रतिरक्षा प्रणाली दोनों को नुकसान पहुंचाती है। इस संक्रमण से पषु को दीर्घकालिक दस्त और वजन कम हो जाता है और पशु एक या दो प्रसव के भीतर अनुत्पादक हो जाता है। ऐसे संक्रमित पशुओं के दूध को मनुष्यों द्वारा सेवन करने पर यह संक्रमण मनुष्यों में तथा पशुओं की आने वाली अगली पीढ़ी में संचारित होता रहता है।
यह भी कह सकते हैं कि यह एक दूध के माध्यम से पशुओं की अगली पीढ़ी तथा मनुष्यो में फैलने वाले संक्रमण को रोकने के लिए ही जीएलए बायोटेक विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. शूरवीर सिंह के नेतृत्व में बायोटेक टीम पहले ही इंजेक्शन के रूप में एक अत्यधिक प्रभावी टीका जाॅन्स रोग के विरूद्ध विकसित कर चुकी है। यह टीका बायोवेट मालर बैंगलोर कंपनी के साथ मिलकर बनाया गया था और जिसमें 2008 से 2014 तक के 6 वर्षों के अथक प्रयासों से निर्मित किया गया एवं डीसीजीआई भारत सरकार द्वारा मान्यता भी दी गई थी। भारत बायोवेट के प्रमुख डाॅ. इल्ला इस प्रोजेक्ट में पूरी तरह से सम्मिलत थे। यह डाॅ. इल्ला वही व्यक्ति हैं जिन्होंने, कोविड़-19 हेतु को-वैक्सीन बनाई, अपनी दूसरी कंपनी भारत बायोवेट के द्वारा जो कि हैदराबाद में स्थित है। उन्होंने ने जोन्स रोग के टीका बनाने की विधि की तर्ज पर ही कोविड वैक्सीन बनाई है, जिसमें उनको जोन्स रोग के टीके के अनुभव का पूरा लाभ मिला।

Prof. Shoorvir Singh

चूंकि देश में 500 मिलियन से अधिक घरेलू पशुधन है, जो कि बहुत कम दूध व मास उत्पादक है। इस कम उत्पादकता का मुख्य कारण केवल भारत में ही नहीं अपितु विश्व स्तर पर घरेलू पशुधन आबादी में इस रोग का अत्याधिक संक्रमण है। इसलिए प्रत्येक जानवर को हर वर्ष या तीन वर्ष में एक बार (पशुओं की स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर) इंजेक्शन लगाना संभव नहीं है। इस बड़ी समस्या को देखते हुए टीम ने उपयोगकर्ता के अनुकूल ‘ओरल वैक्सीन‘ का विचार प्रस्तावित किया है, ताकि किसान निर्देशों के अनुसार अपने जानवरों को मौखिक रूप से टीकाकरण कर सकें। इस वैक्सीन को 18 महीने के रिकॉर्ड समय में बनाकर बाजार में लाने की एक बड़ी चुनौती है।

विभागाध्यक्ष प्रो. शूरवीर सिंह ने बताया कि डीबीटी-बाईरैक के माध्यम से मिले प्रोेजेक्ट के तहत तैयार की जाने वाली यह ‘ओरल वैक्सीन‘ (टीका) एक पोलियो रोग के टीके की तरह है। इस वैक्सीन को पशु को मुंह के माध्यम से दिया जायेगा। टीका भी चिकित्सीय प्रकृति का होगा और अनुत्पादक पशुओं की उत्पादकता में सुधार करके उन्हें किसानों के लिए उपयोगी बना देगा। उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर कार्य करने के लिए 38 लाख की राशि जारी हुई है। इसमें पीएचडी के विद्यार्थियों का भी सहयोग लिया जायेगा।

जीएलए प्रबंधन ने बायोटेक विभाग की इस उपलब्धि की सराहना की है और जीएलए विश्वविद्यालय पर विचार करने और विश्वविद्यालय की अनुसंधान क्षमता में विश्वास जताने के लिए डीबीटी बाईरैक को धन्यवाद दिया है।

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