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जिस बीमारी बेटी खोई, अब बेटा भी उसी से पीड़ित:भारत में इलाज नहीं, अमेरिका से मंगवाना पड़ता है इंजेक्शन, हर महीने 8 लाख खर्च

बड़वानी : बड़वानी जिले के तलवाड़ा डेब गांव में 5 साल का मासूम मोहम्मद बिलाल एक ऐसी दुर्लभ से जूझ रहा है। बीमारी का नाम ‘गौचर डिजीज’ है। ये लाखों बच्चों में से किसी एक को होती है।

इस बीमारी का इलाज ‘एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी’ से ही संभव है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस थेरेपी की दवा भारत में उपलब्ध नहीं है। बिलाल को लगने वाला इंजेक्शन अमेरिका से मंगवाना पड़ता है।

क्या है बीमारी और इसका असर?

एमडी डॉ. मदनसिंह सोलंकी के अनुसार, गौचर डिसीज दुर्लभ और आनुवंशिक बीमारी है। शरीर में एक खास तरह की वसा (चर्बी) को तोड़ने वाला एंजाइम होता है। जब इसकी कमी हो जाती है, तो शरीर में वह वसा जमा होने लगती है। इससे बच्चे के लिवर, तिल्ली, हड्डियों, फेफड़ों और दिल का आकार बढ़ने लगता है। इससे पेट फूल जाता है।

सही समय पर इलाज न मिले तो यह जानलेवा हो सकता है। मरीज को हर समय दर्द, थकान और सूजन रहती है। शरीर पर जल्दी चोट के निशान दिखने लगते हैं। इसके तीन प्रकार (टाइप-1, 2 और 3) होते हैं।

दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने बिलाल के इलाज पर 20 लाख रुपए से ज्यादा का खर्च बताया है। वहीं, हर महीने लगने वाले जरूरी इंजेक्शन को अमेरिका से मंगवाने में ही लगभग 7.50 लाख से 8 लाख रुपए का खर्च आता है, जो इस गरीब परिवार की पहुंच से बिल्कुल बाहर है।

बिलाल के पिता शरीफ मंसूरी रजाई-गद्दे भरने का काम करते हैं और दिन में मुश्किल से 300 से 400 रुपए कमा पाते हैं। उनकी मां नूरजहां मंसूरी हाउसवाइफ हैं। इतने कम संसाधनों में इस खर्चीली बीमारी का इलाज कराना परिवार के लिए नामुमकिन साबित हो रहा है।

बिलाल के पिता शरीफ मंसूरी रजाई-गद्दे भरने का काम करते हैं।

बिलाल के पिता शरीफ मंसूरी रजाई-गद्दे भरने का काम करते हैं।

साल 2021 में बिलाल के इलाज के लिए उसकी मां, पिता और दादी ने तत्कालीन कलेक्टर और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से मुलाकात की थी। इस दौरान चाइल्ड लाइन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी मदद की कोशिश की, लेकिन कोई ठोस सरकारी समाधान नहीं निकल सका।

कुछ समय तक समाजसेवियों और संस्थाओं (NGO) की मदद से इलाज चला, लेकिन अब वह सहारा भी धीरे-धीरे बंद हो रहा है, जिससे परिवार के सामने संकट खड़ा हो गया है।

बेटी की मौत के बाद मिला PMO से मदद का पत्र

बिलाल की मां नूरजहां मंसूरी ने बताया कि यह बीमारी उनके परिवार के लिए नई नहीं है। इसी बीमारी के कारण जनवरी 2021 में साढ़े तीन साल की बेटी मिस्बाह की भी मौत हो चुकी है। सबसे दु:खद बात यह रही कि मिस्बाह के इलाज के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से आर्थिक मदद की मंजूरी का पत्र तब मिला, जब उसकी मौत हुए दो महीने बीत चुके थे। इसके बाद उसका जवाब नहीं दिया। अब परिवार को डर है कि बेटे को भी नहीं खो दें।

बिलाल की स्थिति और परिवार की मुश्किलें

बिलाल का जन्म 8 फरवरी 2021 को हुआ था। जब वह सिर्फ 5 महीने का था, तब उसके पेट में पानी की गांठ और हर्निया की समस्या हुई। इंदौर के चोइथराम अस्पताल में ऑपरेशन हुआ, तभी जांच के दौरान इस दुर्लभ बीमारी का पता चला।

बीमारी के कारण बिलाल के लिवर में सूजन है, पेट फूला रहता है और तिल्ली बढ़ गई है। उसकी हड्डियां कमजोर हो गई हैं और हाथ-पांव पतले पड़ गए हैं। बच्चा इतना कमजोर है कि वह अपना खुद का वजन भी नहीं संभाल पाता।

बीमारी से बच्चे को स्कूल भी नहीं भेज रहे

नूरजहां मंसूरी ने बताया कि बिलाल का 24 घंटे ख्याल रखना पड़ता है, इसलिए उसे स्कूल भी नहीं भेज पाते। इलाज के लिए उधार लेकर पैसा जुटाना पड़ता है। महीने में दो बार उसे भोपाल एम्स ले जाना पड़ता है, जहां एक बार में 5 हजार से ज्यादा खर्च होते हैं। अधिकारियों और नेताओं से कई बार मदद मांगी, पर ठोस सहायता नहीं मिली।

जिले में इस बीमारी के सिर्फ 2 केस

मध्य प्रदेश में इस बीमारी के 20 से ज्यादा मामले बताए जाते हैं। बड़वानी जिले में ऐसे दो मरीज सामने आए और ये दोनों एक ही परिवार के बच्चे (मिस्बाह और बिलाल) हैं। डॉक्टर्स का कहना है कि यह एक खानदानी बीमारी है।

डॉक्टर्स के मुताबिक, इसमें बच्चे का खून 7 से 8 पॉइंट से ऊपर नहीं बढ़ता। इस वजह से जिला अस्पताल में हर चौथे-पांचवें महीने उसे बाहर से खून चढ़ाना पड़ता है। अगर समय पर दवा न मिली, तो जान का खतरा बना रहता है।

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