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Lok Sabha Election 2024: सियासी ‘नौका’ को जातिवाद के ‘चप्पू’ का सहारा

  • पिछड़ों की राजनीति को सभी दल बनाते रहे हैं चुनावी लड़ाई में हथियार

नई दिल्ली : राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन। बरसों से चल रही इस कहावत का जीता-जागता उदाहरण बिहार है। यह भी कहा जाता है कि जाति-समुदायों के आधार पर राजनेता ही नहीं बल्कि राजनीतिक दल भी किस तरह से सियासी गोटियां फिट करते हैं, इसकी बानगी भी बिहार से बेहतर कहीं नहीं मिल सकती। पिछड़ों की राजनीति को अपना मुख्य हथियार बनाने की राजनीतिक दलों की कवायद के बीच इन दिनों बिहार का समस्तीपुर खासी चर्चा में हैं। यह वही समस्तीपुर है जहां से नब्बे के दशक में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर तत्कालीन सीएम लालू प्रसाद यादव ने उनकी राम रथयात्रा को बीच में ही रोक दिया था। लेकिन, इस बार समस्तीपुर की चर्चा बिहार में जननायक की पहचान रखने वाले पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने के कारण हो रही है। आखिर कर्पूरी ठाकुर जननायक कैसे बन गए, और बिहार की राजनीति में उनका कैसा योगदान रहा, यह जानने की उत्कंठा लिए मैं समस्तीपुर शहर से 12 किलोमीटर दूर कर्पूरी ग्राम पहुंचा, जहां कर्पूरी ठाकुर का जन्म हुआ था। घर पर उनकी पौत्री स्नेहा मिलीं। वे जीकेपी कॉलेज में प्राचार्य हैं। भारत रत्न मिलने पर कहने लगीं कि दादा सभी के साथ जुड़े हुए थे, क्या पक्ष-क्या विपक्ष। हमेशा लोग उनको घेरे रहते थे। वे इस सम्मान के काबिल थे, भले ही देरी से मिला हो। उन्होंने इस छोटे से गांव में स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल बनवाए। वे खुद पढ़ाई करने दरभंगा तक पैदल जाते थे, इसलिए उन्होंने सबसे पहले यहां स्कूल खोला ताकि यहां के बच्चों को पढ़ाई के लिए संघर्ष नहीं करना पड़े। बिहार की मौजूदा स्थिति पर स्नेहा बताने लगीं कि शिक्षा में सुधार की जरूरत है। युवाओं में स्किल बढ़ाने की जरूरत है। शिक्षा और स्किल से ही पलायन रुकेगा। रोजगार बड़ा मुद्दा है।

कर्पूरी ठाकुर के नाम पर ही गांव और रेलवे स्टेशन का नामकरण हुआ है। गांव के एक किनारे गिट्टी का पहाड़ दिखा। यहां हाइवे से गिट्टी का परिवहन होता नजर आया। सड़क किनारे नीम के पेड़ के नीचे बैठे जामुन सिंह बताने लगे कि वे कर्पूरी ठाकुर के साथ रहे हैं। उनका किसी से विवाद नहीं था। वैसे उस वक्त की राजनीति का माहौल भी अलग ही था। ऐेसे भी लोग थे जो कर्पूरी ठाकुर के घर रह कर खाते थे, लेकिन वोट विपक्ष को देते थे। मौजूदा हालात पर हो रही इस चर्चा में मंदिर के पास बैठे भोला सिंह भी शामिल हो गए। बताने लगे कि नीतीश और लालू प्रसाद यादव ने कर्पूरी बाबू के पास रहकर ही राजनीति सीखी। कर्पूरी बाबू जीवनभर फूस के मकान में रहे, कभी अपना पक्का मकान नहीं बनवाया। आजकल के नेता एक चुनाव जीतने के बाद जमीन पर ही नहीं रहते। बिहार की सियासत की बात आई तो कहने लगे, कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ों को आगे बढ़ाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। इतना ही नहीं उन्होंने शिक्षा के माध्यम से लोगों को अपने अधिकारों के लिए लडऩा सिखाया था।

मुद्दों की यहां कोई चर्चा नहीं

गांव में मिले युवा जितेंद्र प्रसाद सिंह से बिहार की राजनीति पर बात शुरू हुई तो कहने लगे, यहां कोई मुद्दा नहीं होता। बस जाति के आधार पर चुनाव लड़ा जाता है। इस बार अयोध्या का राम मंदिर ही छाया हुआ है। उनका कहना था कि बिहार में शिक्षा व्यवस्था में बहुत सुधार करना होगा। किसान आंदोलन बिहार में बेअसर है। हालांकि सरकारी सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। उनका कहना था कि मुफ्त की योजनाएं बंद होनी चाहिए। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। शराबबंदी प्रभावी हो, इसलिए उल्लंघन करने वालों को सरकारी स्तर पर किसी तरह की राहत नहीं मिलनी चाहिए।

ओबीसी को साधने की कोशिश

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर केंद्र की भाजपा नीत सरकार ने ओबीसी के साथ बिहार के मतदाताओं को भी साधा है। कर्पूरी ठाकुर ओबीसी वर्ग से आते हैं। पूरे बिहार में उनको माना जाता है। भारत रत्न देकर बिहार को भी गौरवान्वित किया है। हालांकि एक पक्ष यह भी है कि बिहार में मतदाताओं में अधिकांश अब भी जाति के आधार पर ही वोट डालते हैं। इसीलिए बिहार की राजनीति के बारे में यह कहा जाता है कि जाति यहां से जाती नहीं है। सभी राजनीतिक दल जातीय समीकरणों को देखकर ही सियासी गोटियां फिट करने के प्रयासों में रहते आए हैं।

परिवारवाद बनाम ‘मोदी का परिवार’

बिहार के पूर्व सीएम लालू यादव की ओर से पीएम मोदी के खिलाफ दिए गए बयान के बाद यह नया सियासी मुद्दा बन गया है। लालू ने अपने भाषण में कहा था कि मोदी परिवारवाद पर हमला कर रहे हैं और मोदी के पास परिवार ही नहीं है। लालू ने महंगाई और बेरोजगारी पर बोलते हुए कहा कि मोदी नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं। इस बयान के बाद भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं ने अपने सोशल मीडिया के अकाउंट पर ‘मोदी का परिवार’ स्टेटस लगाकर लालू के बयान का जवाब दिया। कुछ घंटों में ही पार्टी कार्यकर्ताओं ने इसे देशव्यापी मुहिम बना दी। लेकिन देखने को मिला कि किसी ने लालू के महंगाई और बेरोजारी के बयान पर कुछ नहीं बोला।

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