नई दिल्ली : राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू गणतंत्र दिवस समारोह में पारंपरकि बग्घी में बैठकर पहुंचीं। 1984 के बाद पहली बार राष्ट्रपति ने गणतंत्र दिवस पर इस बग्घी की सवारी की। समारोह के मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी उनके साथ बग्घी में बैठकर कर्तव्य पथ पहुंचे।
पहली बार 1950 में गणतंत्र दिवस पर इस बग्घी का इस्तेमाल किया गया था। 1984 तक यह परंपरा जारी रही। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इसकी जगह हाई सिक्योरिटी कवर वाली कार इस्तेमाल होने लगी।
1950 में पहले गणतंत्र दिवस समारोह में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राजपथ पर हुई परेड में इसी बग्घी में बैठकर हिस्सा लिया था। शुरुआती सालों में भारत के राष्ट्रपति सभी सेरेमनी में इसी बग्घी से जाते थे और साथ ही 330 एकड़ में फैले राष्ट्रपति भवन के आसपास भी इसी से चलते थे।
वायसराय की बग्घी भारत को टॉस जीतकर मिली
सोने की परत चढ़ी, घोड़ों से खींची जाने वाली ये छोटी गाड़ी, यानी बग्घी मूल रूप से भारत में ब्रिटिश राज के दौरान वायसराय की थी। 1947 में आजादी के बाद गवर्नर जनरल के बॉडीगार्ड, जिन्हें अब राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड के रूप में जाना जाता है, को 2:1 के अनुपात में भारत-पाकिस्तान के बीच बांट दिया गया। जब वायसराय की बग्घी की बारी आई तो दोनों देश इस पर अपना दावा ठोकने लगे।
आखिरकार इसका फैसला टॉस से हुआ। राष्ट्रपति के बॉडीगार्ड रेजिमेंट के पहले कमांडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल ठाकुर गोविंद सिंह और पाकिस्तानी सेना के साहबजादा याकूब खान के बीच बग्घी को लेकर टॉस हुआ। इसमें जीत भारत की हुई और इस तरह ये बग्घी भारत को मिल गई।

