नई दिल्ली : अमेरिका की तरफ से H-1B वीजा के लिए एप्लिकेशन फीस बढ़ाने पर राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर निशाना साधा। राहुल ने शनिवार को सोशल मीडिया X पर लिखा कि भारत के पास कमजोर प्रधानमंत्री है। राहुल ने 2017 का पोस्ट फिर से शेयर किया, उस वक्त भी उन्होंने मोदी पर आरोप लगाया था कि पीएम ने H-1B वीजा पर अमेरिका से बात नहीं की थी।
वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने लिखा कि मोदी ने बर्थडे पर जो रिटर्न गिफ्ट दिया है उससे हर भारतीय दुखी है। राष्ट्रीय हित सबसे पहले है। गले मिलना और लोगों से मोदी-मोदी के नारे लगवाना विदेश नीति नहीं है।
दरअसल अमेरिका अब H-1B वीजा के लिए एक लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपए) एप्लिकेशन फीस वसूलेगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को व्हाइट हाउस में इस ऑर्डर पर साइन किए। अब तक H-1B वीजा की एप्लिकेशन फीस 1 से 6 लाख रुपए तक थी।
खड़गे ने लिखा- 70% H-1B वीजा धारक भारतीय हैं
खड़गे ने आगे लिखा कि H-1B वीजा पर एक लाख डॉलर की एनुअल फीस भारतीय टेक कर्मचारियों पर सबसे ज्यादा असर डालता है, 70% H-1B वीजा धारक भारतीय हैं। भारत पर 50% टैरिफ पहले ही लगाया जा चुका है। अकेले 10 क्षेत्रों में भारत को ₹2.17 लाख करोड़ का नुकसान होने का अनुमान है।
विदेश नीति का मतलब है हमारे राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना। भारत को सर्वोपरि रखना, और समझदारी व संतुलन के साथ मित्रता को आगे बढ़ाना। इसे दिखावटी दिखावा नहीं माना जा सकता जिससे हमारी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का खतरा हो।
गोगोई बोले- मोदी की चुप्पी देश के लिए बोझ बन गई
गौरव गोगोई ने कहा, एच1-बी वीजा पर हालिया फैसले से अमेरिकी सरकार ने भारत के प्रतिभाशाली लोगों के भविष्य को चोट पहुंचाई है। मुझे आज भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वो बात याद है जब अमेरिका में हमारी महिला राजदूत का अपमान किया गया था। तो पीएम ने कैसे बदला लिया। लेकिन आज मोदी की रणनीतिक चुप्पी और दिखावटी प्रचार भारत और उसके नागरिकों के राष्ट्रीय हित के लिए एक बोझ बन गया है।
अब जानिए क्या है H-1B वीजा
H-1B वीजा एक एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है। यह वीजा लॉटरी के जरिए दिए जाते रहे हैं क्योंकि हर साल कई सारे लोग इसके लिए आवेदन करते हैं।
यह वीजा स्पेशल टेक्निकल स्किल जैसे IT, आर्किटेक्चर और हेल्थ जैसे प्रोफेशन वाले लोगों के लिए जारी होता है।
इसकी समय सीमा 3 साल के लिए होती है, लेकिन जरूरत पड़ने पर 3 साल बढ़ाया जा सकता है। रिन्यू करवाने पर फीस (6 लाख तक) के बराबर ही शुल्क ही देना होता था।
अब नियमों में बदलाव के बाद हर साल 88 लाख रुपए लगेंगे।
हर साल 85 हजार H-1B वीजा जारी होते हैं
अमेरिकी सरकार हर साल 85,000 एच-1बी वीजा जारी करती है, जिनका इस्तेमाल ज्यादातर तकनीकी नौकरियों में होता है। इस साल के लिए आवेदन पहले ही पूरे हो चुके हैं।
आंकड़ों के अनुसार, केवल अमेजन को ही इस साल 10,000 से ज्यादा वीजा मिले हैं, जबकि माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी कंपनियों को 5,000 से अधिक वीजा स्वीकृत हुए हैं।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल H-1B वीजा का सबसे ज्यादा फायदा भारत को मिला। हालांकि इस वीजा कार्यक्रम की आलोचना भी होती है।
कई अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों का कहना है कि कंपनियां H-1B वीजा का इस्तेमाल वेतन घटाने और अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां छीनने के लिए करती हैं।
H-1B वीजा में बदलाव से भारतीयों पर असर
H-1B के नियमों में बदलाव से 2,00,000 से ज्यादा भारतीय प्रभावित होंगे। साल 2023 में H-1B वीजा लेने वालों में 1,91,000 लोग भारतीय थे। ये आंकड़ा 2024 में बढ़कर 2,07,000 हो गई।
भारत की आईटी/टेक कंपनियां हर साल हजारों कर्मचारियों को H-1B पर अमेरिका भेजती हैं। हालांकि, अब इतनी ऊंची फीस पर लोगों को अमेरिका भेजना कंपनियों के लिए कम फायदेमंद होगा।
71% भारतीय H-1B वीजा धारक हैं और यह नई फीस उनके लिए बड़ा आर्थिक बोझ बन सकती है। खासकर मिड-लेवल और एंट्री-लेवल कर्मचारियों को वीजा मिलना मुश्किल होगा। कंपनियां नौकरियां आउटसोर्स कर सकती हैं, जिससे अमेरिका में भारतीय पेशेवरों के अवसर कम होंगे।
इंफोसिस जैसी कंपनियां सबसे ज्यादा H-1B स्पॉन्सर करती हैं
बता दें कि भारत हर साल लाखों इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस के ग्रेजुएट तैयार करता है, जो अमेरिका की टेक इंडस्ट्री में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इंफोसिस, TCS, विप्रो, कॉग्निजेंट और HCL जैसी कंपनियां सबसे ज्यादा अपने कर्मचारियों को H-1B वीजा स्पॉन्सर करती हैं।
कहा जाता है कि भारत अमेरिका को सामान से ज्यादा लोग यानी इंजीनियर, कोडर और छात्र एक्सपोर्ट करता है। अब फीस महंगी होने से भारतीय टैलेंट यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, मिडिल ईस्ट के देशों की ओर रुख करेगा।

