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पकड़ौआ शादी पर हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला, बंदूक की नोक के दम पर सिंदूर लगाने से नहीं होती शादी

नई दिल्ली : बिहार में पिछली सदी के 80-90 दशक में हथपकड़ा या पकड़ौआ शादी (Pakadua Vivah) बहुत आम थी। लेकिन कई मामलों में वर पक्ष में कोर्ट की शरण में जाने से शादी खुशी की जगह गले की फांस बनती हुई दिखने लगी। कई मामलों में शादी के बाद गोली, डंडे चले और शादी को लड़का परिवार से मान्यता नहीं मिलने पर लड़की की जिंदगी बर्बाद होने लगी और इस कुप्रथा पर रोक लगने लगी। बेटियों के बाप को भी धीरे-धीरे यह समझ आने लगा कि अगर बोझ या मजबूरी समझकर उनकी शादियां इस तरह जोर-जबरदस्ती से करके जिंदगी बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं। हालांकि ऐसी जबरन हथपकड़ा शादी की घटना भी कई बार सुर्खियां बनती हैं। ऐसा ही एक मामला पटना हाईकोर्ट के समक्ष पेश हुआ। पटना हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जबरन सिंदूर लगाया या दबाव डालकर शादी करना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह नहीं माना जाएगा।

बिहार के नवादा जिले में जबरन बंदूक की नोक पर रविकांत नाम के व्यक्ति की शादी करा दी गई। इस मामले में पटना हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक दोनों की इच्छा न हो और दूल्हा और दुल्हन सात फेरे नहीं ले लेते तब तक इसे विवाह नहीं माना जाएगा। रविकांत भारतीय सेना में कांस्टेबल के पद पर नौकरी करता है। उन्हें लकड़ी के परिवार वालों ने 10 साल पहले यानी 2013 में बंदूक की नोक पर किडनैप करके जबरन शादी करा दी। रविकांत का अपहरण लखीसराय के एक मंदिर में प्रार्थना के दौरान किया गया था। युवक रविकांत ने शादी की रीति संपन्न होने से पूर्व दुल्हन के घर से निकल भागे थे और जम्मू-कश्मीर जाकर अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली। वहां से छुट्टी पर घर लौटने पर रविकांत ने लखीसराय की फैमिली कोर्ट में शादी को रद्द करने की अर्जी डाल दी। इस मामले की याचिका 7 साल बाद यानी 27 जनवरी 2020 को लखीसराय अदालत ने खारिज कर दी। इसके बाद रविकांत ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की।

पटना हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई कर रहे दो जजों की खंडपीड में शामिल पी. बी. बजंथरी और अरुण कुमार झा ने निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। पटना हाईकोर्ट ने यह माना कि फैमिली कोर्ट ने ‘त्रुटिपूर्ण’ दृष्टिकोण अपनाया कि याचिकाकर्ता का मामला ‘अविश्वसनीय’ हो गया क्योंकि उसने विवाह को रद्द करने के लिए ‘तुरंत’ मुकदमा दायर नहीं किया था। खंडपीठ ने कहा, ‘याचिकाकर्ता ने स्थिति स्पष्ट कर दी है और कोई अनुचित देरी नहीं हुई है।’ खंडपीठ ने कहा कि हिंदू परंपराओं के अनुसार कोई भी शादी तब तक वैध नहीं हो सकती जब तक की सप्तपदी की रस्म पूरी नहीं होती।

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