उत्तर प्रदेश : यूपी में गर्मी दिन-पर-दिन बढ़ रही है। बिजली की मांग भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है। मार्च के पहले सप्ताह में ही डिमांड 19 हजार मेगावाट (MW) के पार पहुंच गई है। पिछले साल भी फरवरी से बिजली की मांग बढ़नी शुरू हो गई थी, जो 32 हजार मेगावाट पर जा पहुंची थी। इस बार अनुमान है कि मई-जून में बिजली की मांग 33 हजार मेगावाट तक पहुंच सकती है।
लेकिन सवाल यह कि इतनी बिजली कहां से आएगी? ट्रांसमिशन की क्षमता भी उपभोक्ताओं के स्वीकृत भार की तुलना में 2.05 लाख करोड़ किलोवाट कम है। बिजली का उत्पादन सीमित है, डिस्ट्रिब्यूशन व्यवस्था चरमरा रही है। ऐसे में लोगों के घरों तक बिजली कैसे पहुंचेगी?
यूपी देश का इकलौता राज्य है, जहां आज भी रोस्टर से बिजली मिल रही है।
कंज्यूमर राइट रूल- 2020 लागू होने के बावजूद यूपी देश का एकमात्र राज्य है, जहां आज भी रोस्टर चल रहा है। पूरे देश में 24 घंटे बिजली दी जा रही, लेकिन यूपी में ग्रामीण इलाकों में 18 घंटे का रोस्टर लागू है।
बिजली सिस्टम को समझ सकते हैं
- यूपी में बिजली उत्पादन क्षमता
- यूपी पावर ट्रांसमिशन की क्षमता
- प्रदेश में कुल उपभोक्ता और मांग

यूपी में कितनी बिजली उपलब्ध है?
ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने बजट सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में कहा था कि राज्य में 31 हजार मेगावाट से ज्यादा बिजली की उपलब्धता है। इसमें राज्य स्वामित्व वाली कंपनियों की उत्पादन क्षमता 18,136 मेगावाट है। वहीं प्राइवेट सेक्टर से अनुबंध के तहत प्रदेश सरकार को 8,814 मेगावाट बिजली मिलती है।
इसके अलावा सेंट्रल पूल, एनटीपीसी आदि से 7,621 मेगावाट बिजली मिलती है। सोलर क्षमता भी 2,815 मेगावाट पहुंच चुकी है। हालांकि सोलर से बिजली का उत्पादन दिन के समय और मौसम पर निर्भर है। कुल मिलाकर वर्तमान में यूपी में औसत बिजली की खपत 724 यूनिट प्रति वर्ष पहुंच चुकी है।

प्रदेश में उपभोक्ताओं के भार की तुलना में ट्रांसमिशन कंपनी के 132 केवी सबस्टेशन की क्षमता 2.05 लाख करोड़ किलोवाट कम है।
होली पर नहीं दे पाए 19 हजार मेगावाट की सप्लाई
यूपी में भले ही बिजली की उपलब्धता 31 हजार मेगावाट से अधिक बताई जाए। 3 मार्च की रात 8.17 बजे प्रदेश में बिजली की मांग 19,830 मेगावाट तक पहुंच गई थी। लेकिन, बिजली विभाग सिर्फ 17,211 मेगावाट की ही बिजली सप्लाई कर पाया। मतलब, डिमांड की तुलना में लगभग ढाई हजार मेगावाट की सप्लाई करने में बिजली विभाग फेल रहा। इसकी भरपाई के लिए कटौती करनी पड़ी।
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा सवाल उठाते हैं कि जब प्रदेश में बिजली की उपलब्धता पर्याप्त है, तो ये कटौती क्यों? देश में यूपी ऐसा पहला राज्य है, जहां कंज्यूमर राइट रूल 2020 लागू होने के बावजूद रोस्टर चल रहा है।
ट्रांसमिशन और डिस्ट्रिब्यूशन की हकीकत जानिए
यूपी में बिजली उत्पादन मुख्य रूप से UPRVUNL के प्लांट्स और शेयर वाली सेंट्रल जनरेटिंग स्टेशन (SSGS) से होता है। लेकिन, ट्रांसमिशन लाइनें और सब-स्टेशन पुराने पड़ चुके हैं। वर्टिकल व्यवस्था लागू होने के बाद मैनपावर भी कम हो गई है। संविदा कर्मचारियों की छंटनी हो रही है। प्रदेश के 3 करोड़ 72 लाख उपभोक्ताओं को निर्बाध बिजली देने के लिए स्टाफ बढ़ाना चाहिए था, उल्टा कटौती की जा रही है।
प्रदेश में 3.72 करोड़ उपभोक्ताओं का कुल बिजली भार 8.40 करोड़ किलोवाट से अधिक है। ट्रांसमिशन कंपनी की 132 केवी सब-स्टेशनों की उपलब्ध क्षमता ही कुल 6.35 करोड़ किलोवाट है। 2.05 करोड़ किलोवाट का अंतर है। इसके अलावा प्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत बिजली चोरी होती है। यही वजह है कि प्रदेश में डिमांड की तुलना में कभी भी प्रदेश में बिजली की सप्लाई नहीं हो पाती।
33 हजार मेगावाट की डिमांड कैसे पूरी करेगा विभाग
यूपी पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल के मुताबिक, पिछली बार प्रदेश में मई-जून में बिजली की हाईएस्ट डिमांड 32 हजार मेगावाट के करीब पहुंची थी। इस बार बिजली विभाग का अनुमान है कि यह 33 हजार मेगावाट तक पहुंच सकती है।
इसे देखते हुए बिजली विभाग ने ठंड से ही तैयारी शुरू कर दी थी। विभाग ने मध्यप्रदेश, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, राजस्थान सहित कई राज्यों में 5500 मेगावाट तक बिजली की बैंकिंग की है।
मतलब, यूपी में ठंड में जब बिजली की मांग कम थी, तब इन राज्यों को अपने कोटे की बिजली दी थी। जिससे उतनी बिजली गर्मी में वह अपने जरूरत के समय उनसे लेगी। इसमें सिर्फ ट्रांसमिशन का खर्च लगता है।
पावर कॉरपोरेशन का दावा है कि जब प्रदेश में बिजली की मांग बढ़ेगी, तो बैंकिंग की बिजली का उपयोग करेंगे। इसके अलावा बिजली विभाग शॉर्ट टर्म का बिजली खरीदी का अनुबंध भी करता है।
ये भी मई से लेकर जुलाई के बीच के लिए किया जाता है। कई बार जरूरत पड़ने पर ओपन मार्केट से बिजली ली जाती है, लेकिन तब बिजली की दर बहुत ज्यादा होती है।
मांग के अनुरूप बिजली उपलब्ध नहीं
यूपी विद्युत संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे के मुताबिक, बिजली विभाग कभी भी प्रदेश की मांग के अनुरूप बिजली उपलब्ध नहीं कर पाता। इसकी वजह भी है। एक तो प्रदेश की बिजली वितरण का सिस्टम अभी पूरी तरह से अपग्रेड नहीं हुआ है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई जगह लाइनें बदली नहीं जा सकी हैं। ट्रांसफार्मरों की क्षमता लोड की तुलना में काफी कम है। इस वजह से गर्मी में अक्सर ट्रांसफार्मर जल जाती है। कई बार ओवरलोड के चलते बिजली के तार टूट जाते हैं।

