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Thu. Feb 12th, 2026

हरिद्वार में जगह-जगह लगे पोस्टर, हरकी पौड़ी में गैर हिंदुओं की एंट्री पर रोक! ड्रोन व रील पर भी सख्ती

  • श्री गंगा सभा ने हरकी पैड़ी की पवित्रता बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाए हैं, 10 से अधिक स्थानों पर अहिन्दू प्रवेश निषेध के बोर्ड लगाए गए हैं

हरिद्वार : सनातन आस्था के प्रमुख तीर्थ हरकी पैड़ी की पवित्रता और मर्यादा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए श्री गंगा सभा ने सख्त रुख अपनाया है। हरकी पैड़ी क्षेत्र के 10 से अधिक स्थलों पर अहिन्दू प्रवेश निषेध क्षेत्र के बोर्ड लगाए गए हैं।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि हरकी पैड़ी और मालवीय द्वीप क्षेत्र में ड्रोन उड़ाना, फिल्मी गीतों पर रील बनाना अथवा किसी भी प्रकार का फिल्मांकन पूर्णत प्रतिबंधित है। नियमों का उल्लंघन कर बनाई गई सामग्री यदि इंटरनेट मीडिया पर वायरल होती है, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध श्री गंगा सभा की ओर से कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

हरिद्वार में श्री गंगा सभा, तीर्थ पुरोहित, संत-संन्यासी और धार्मिक संगठन की ओर से सरकार से कुंभ क्षेत्र को अमृत क्षेत्र घोषित करने की मांग की जा रही है। इस क्षेत्र में प्रवेश के लिए हिंदू श्रद्धालु, अधिकारी, पत्रकार और स्वयंसेवक ही पात्र हों, जिससे सनातन परंपराओं की मर्यादा बनी रहे।

इसी बीच गुरुवार की रात को हरकी पैड़ी, मालवीय द्वीप और अस्थि प्रवाह घाट क्षेत्र में अहिन्दू प्रवेश निषेध के बोर्ड लगाए गए हैं।

श्री गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने बताया कि बोर्ड लगाने का उद्देश्य श्रद्धालुओं को हरकी पैड़ी क्षेत्र के नियमों और कानूनों की सही जानकारी देना है। इस क्षेत्र में उसी के लिए प्रवेश है जो श्रद्धालु गंगा में स्नान करता है, प्रसाद ग्रहण करता है, गंगा जल का आचमन करता है, उसकी आस्था हिंदू धर्म, हमारी देव परंपराओं और सनातन संस्कृति से जुड़ी होती है। इसी आस्था के भाव के साथ श्रद्धालु हरकी पैड़ी आता है और उसकी पवित्रता बनाए रखना सभी का दायित्व है। 

नितिन गौतम ने कहा कि हरकी पैड़ी पर जो नियम लागू हैं, इसी नियम का विस्तार पूरे कुंभ क्षेत्र में किए जाने की मांग लगातार उठ रही है। कुंभ क्षेत्र को अमृत क्षेत्र घोषित किया जाना चाहिए, ताकि वहां गैर-हिंदुओं का प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित हो सके। उम्मीद है सरकार जल्द ही इस पर निर्णय लेगी।

तीर्थ पुरोहित उज्जवल पंडित ने कहा कि बोर्ड लगाना कोई नया निर्णय नहीं है। यह नियम म्युनिसिपल एक्ट वर्ष 1916 से अस्तित्व में है और नगर निगम के बायलॉज में दर्ज है। बोर्ड केवल उसी व्यवस्था की जानकारी सार्वजनिक रूप से देने का माध्यम हैं, ताकि किसी को भ्रम न रहे कि किस धर्म और आस्था से जुड़े लोगों के लिए यह तीर्थ क्षेत्र निर्धारित है।

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