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बिहार में वोटर लिस्ट रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई:अदालत ने कहा- EC के एक्शन से समस्या नहीं, लेकिन यह चुनाव से पहले क्यों

पटना : बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट के रिवीजन मामले में सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को सुनवाई जारी है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि वोटर लिस्ट रिवीजन नियमों को दरकिनार कर किया जा रहा है। वोटर की नागरिकता जांची जा रही है। ये कानून के खिलाफ है।

इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) यानी वोटर लिस्ट रिवीजन में नागरिकता के मुद्दे में क्यों पड़ रहे हैं, यह गृह मंत्रालय (MHA) का क्षेत्राधिकार है। SIR के खिलाफ राजद सांसद मनोज झा, TMC सांसद महुआ मोइत्रा समेत 11 लोगों ने याचिकाएं दाखिल की गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से वकील गोपाल शंकर नारायण, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी दलील दे रहे हैं। चुनाव आयोग की पैरवी पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल, राकेश द्विवेदी और मनिंदर सिंह कर रहे हैं।

अभिषेक मनु सिंघवी बोले- लाखों लोगों के नाम लिस्ट से हटने की आशंका

अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा- ‘2003 में जब ऐसा व्यापक पुनरीक्षण हुआ था, तब चुनाव में काफी समय बचा था, लेकिन इस बार चुनाव नजदीक हैं, जिससे लाखों लोगों को सूची से हटाने की आशंका है।’

कपिल सिब्बल बोले- नागरिकता साबित करने का बोझ डाला जा रहा

कपिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि- ‘आयोग मतदाताओं पर नागरिकता साबित करने का बोझ डाल रहा है। आयोग को यह बताना चाहिए कि वह किस आधार पर किसी को भारतीय नागरिक नहीं मानता। मतदाता पहचान पत्र, बर्थ सर्टिफिकेट और मनरेगा कार्ड तक को नहीं स्वीकार किया जा रहा है।’

याचिकाकर्ता के वकील ने ये 3 सवाल उठाए

1. चुनाव आयोग की ओर से वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए 11 दस्तावेज स्वीकार किए जा रहे हैं, लेकिन आधार कार्ड और वोटर ID जैसे अहम पहचान पत्रों को मान्यता नहीं दी जा रही है।

2. आयोग की प्रक्रिया स्पष्ट और समान नहीं है। अगर कोई व्यक्ति 2003 की वोटर लिस्ट में शामिल है तो उसे अभिभावकों के दस्तावेज या नागरिकता से जुड़े प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति उस लिस्ट में नहीं है तो उसे नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज जमा करने होंगे।

3. अगर चुनाव आयोग जिस प्रक्रिया को चला रहा है वो सघन पुनरीक्षण (Intensive Revision) है तो नियम के अनुसार अधिकारियों को हर घर जाकर वोटर की जानकारी जुटानी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

चुनाव आयोग ने दिए 2 बड़े तर्क

1. डेढ़ लाख एजेंट जुटे हैं, किसी का नाम नहीं कटेगा

बिहार में फिलहाल करीब 7 करोड़ 89 लाख वोटर हैं। इसमें से करीब 4 करोड़ 96 लाख वोटर 2003 के वोटर लिस्ट में भी शामिल थे। उनका वेरिफिकेशन नहीं होगा। यानी बाकी बचे 2 करोड़ 93 करोड़ वोटरों का ही वेरिफिकेशन किया जाएगा।

इसके लिए राजनीतिक दलों के करीब डेढ़ लाख बूथ लेवल एजेंट (BLA) इस मुहिम में जुटे हैं। इसमें सभी दलों के लोग शामिल हैं। ऐसे में किसी वैध वोटर के नाम कटने की गुंजाइश कम है। अभी भी सभी राजनीतिक दल ज्यादा से ज्यादा BLA बनाकर लिस्ट को पारदर्शी बना सकते हैं।

2. पिछली बार भी 31 दिन में हुआ था वेरिफिकेशन

चुनाव आयोग का कहना है कि पिछली बार यानी 2003 में 31 दिन में ही SIR हुआ था। इस बार भी कमोबेश एक महीने का टाइम है। अभी करीब डेढ़ लाख BLA काम पर जुटे हैं।

एक BLA एक दिन में अधिक से अधिक 50 आवेदन बूथ लेवल आफिसर (BLO) के पास जमा कर सकता है। इस तरह एक दिन 75 लाख से अधिक आवेदन BLO के पास जमा हो सकता है।

राहुल बोले- महाराष्ट्र की तरह बिहार चुनाव में चोरी की कोशिश

बुधवार को बिहार बंद में शामिल हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘चुनाव आयोग मैं आपको साफ बोल रहा हूं। मैं बिहार और हिन्दुस्तान की जनता को स्पष्ट कह रहा हूं कि महाराष्ट्र का चुनाव चोरी किया गया था और वैसे ही बिहार को चुनाव चोरी करने की कोशिश की जा रही है। उन्हें पता है कि हमने महाराष्ट्र मॉडल समझ लिया इसलिए वे बिहार मॉडल लाए हैं। ये गरीबों के वोट छीनने का तरीका है।’

‘ये बिहार है और बिहार की जनता ये नहीं होने देगी। हमारे लोग चुनाव आयोग से जाकर मिले। मैं नहीं जा पाया था। इलेक्शन कमीशन बीजेपी और RSS नेताओं की तरह बात कर रहे हैं।’

‘वो भूल गए कि वो BJP नेता नहीं हैं। मैं कहता हूं आपको जो करना है करिए, लेकिन बाद में कानून आप पर हावी होगा।’

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