दैनिक उजाला, मथुरा: जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर और छात्रों ने अनुसंधान एवं नवाचार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए पशुधन में होने वाले बोवाइन ट्यूबरकुलोसिस और पैराट्यूबरकुलोसिस संक्रमण की एक साथ पहचान के लिए डुप्लेक्स पीसीआर तकनीक विकसित की है। उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (सीएसटीयूपी) द्वारा वित्तपोषित अनुसंधान परियोजना के सफलतापूर्वक पूर्ण होने के बाद विकसित यह तकनीक एक ही जांच में दोनों रोगजनकों की त्वरित एवं सटीक पहचान करने में सक्षम है। इससे पशुधन रोगों के निदान को अधिक प्रभावी और लागत-प्रभावी बनाने के साथ रोग नियंत्रण कार्यक्रमों को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।
इस महत्वपूर्ण अनुसंधान परियोजना का नेतृत्व एवं पर्यवेक्षण असिस्टेंट प्रोफेसर (रिसर्च) डॉ. सौरभ गुप्ता ने किया। उन्होंने बताया कि बोवाइन ट्यूबरकुलोसिस तथा पैराट्यूबरकुलोसिस पशुधन के स्वास्थ्य और उत्पादकता को प्रभावित करने वाले गंभीर संक्रामक रोग हैं। ऐसे में दोनों संक्रमणों की एक साथ पहचान करने वाली यह तकनीक रोग की समय रहते पहचान और प्रभावी नियंत्रण में उपयोगी साबित हो सकती है। एक ही परीक्षण में जांच होने से समय, संसाधन और लागत की बचत भी संभव होगी।
शोध की वैज्ञानिक गुणवत्ता और उपयोगिता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी पहचान मिली है। परियोजना के प्रमुख निष्कर्षों को जर्मनी के ड्रेसडेन में आयोजित 17वें इंटरनेशनल कोलोक्वियम ऑन पैराट्यूबरकुलोसिस में प्रस्तुत किया गया। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की मौजूदगी वाले इस मंच पर शोधकर्ताओं ने विकसित तकनीक की उपयोगिता एवं वैज्ञानिक महत्व की सराहना की। इससे जी.एल.ए. विश्वविद्यालय में पशु जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान मिली है।
नौ अनुसंधान परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूर्ण
डॉ. सौरभ गुप्ता ने बताया कि विभाग के छात्रों के सहयोग से संपन्न हुई यह उपलब्धि एक परियोजना तक सीमित नहीं है। उनके नेतृत्व में अब तक डीबीटी, आईसीएआर-एनएएसएफ, एनआरडीसी सहित विभिन्न राष्ट्रीय वित्तपोषण एजेंसियों द्वारा समर्थित नौ अनुसंधान परियोजनाएँ सफलतापूर्वक पूर्ण की जा चुकी हैं। इन परियोजनाओं के अंतर्गत पशुधन स्वास्थ्य सुधार के लिए न्यूट्रास्यूटिकल फीड, हर्बल औषधीय फॉर्मुलेशन जैसी स्वदेशी तकनीकों के साथ एसएसआर टाइपिंग, एचआरएम और रियल-टाइम क्यूपीसीआर जैसी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों पर भी महत्वपूर्ण कार्य किया गया है। इन शोध प्रयासों का उद्देश्य रोग नियंत्रण, पशुओं की उत्पादकता में वृद्धि और एंटीबायोटिक निर्भरता को कम करना है।
इन अनुसंधान परियोजनाओं के सफल संचालन एवं वैज्ञानिक गुणवत्ता सुनिश्चित करने में प्रोफेसर शूरवीर सिंह का मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा है। उनके वैज्ञानिक नेतृत्व, दूरदर्शी सोच और अनुसंधान की गुणवत्ता पर विशेष जोर ने शोध कार्यों को प्रभावी दिशा प्रदान की। उनके मार्गदर्शन में शोध दल ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए कई नवीन तकनीकों के विकास की दिशा में कार्य किया है, जिससे विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा को मजबूती मिली है।
जैव प्रौद्योगिकी विभागाध्यक्ष डॉ. अंजना गोयल ने कहा कि पशुधन से जुड़े संक्रामक रोगों की त्वरित और सटीक पहचान आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। विभाग द्वारा विकसित डुप्लेक्स पीसीआर तकनीक इसी दिशा में एक उपयोगी वैज्ञानिक प्रयास है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के शोध से न केवल प्रयोगशाला आधारित रोग निदान को गति मिलेगी, बल्कि पशुपालकों के स्तर पर रोग नियंत्रण और पशुधन स्वास्थ्य प्रबंधन को भी बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
कुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता तथा डीन रिसर्च प्रो. कमल शर्मा ने इस उपलब्धि पर डॉ. सौरभ गुप्ता एवं उनकी शोध टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अनुसंधान, नवाचार और समाजोपयोगी तकनीकों के विकास को निरंतर प्रोत्साहित कर रहा है।

