नई दिल्ली : कांग्रेस ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि पीएम मोदी ने ट्रम्प के दबाव पर ईरान के चाबहार पोर्ट से कंट्रोल छोड़ दिया है। पार्टी ने एक्स पर लिखा- मोदी सरकार ने चाबहार प्रोजेक्ट में देश की जनता के 120 मिलियन डॉलर (करीब 1100 करोड़ रुपए) लगाए थे। अब ये बर्बाद हो चुके हैं।
कांग्रेस के इस आरोप को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने खारिज किया। उन्होंने कहा कि ईरान के चाबहार पोर्ट से जुड़ी योजनाएं जारी हैं। इन्हें आगे बढ़ाने के लिए भारत, अमेरिका से बातचीत कर रहा है।
अमेरिका ने भारत को ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बावजूद चाबहार पोर्ट से जुड़े काम जारी रखने के लिए एक खास सैंक्शन छूट दी है, जिसकी अवधि 26 अप्रैल 2026 को खत्म हो रही है।

भारत को अक्टूबर में 6 महीने की छूट दी गई थी
अमेरिकी सरकार ने पिछले साल 29 सितंबर को चाबहार पोर्ट के लिए 2018 में दी गई छूट वापस ले ली थी। यह छूट इसलिए दी गई थी ताकि ईरान पर प्रतिबंध होने के बावजूद भारत चाबहार पोर्ट पर काम कर सकें।
अमेरिका ने भारत को 27 अक्टूबर 2025 तक के लिए चाबहार से व्यापार करने की छूट दी थी। इसके खत्म होने से पहले ही एक बार फिर अमेरिका ने इसे 6 महीने के लिए बढ़ा दिया। यानी अब यह छूट 26 अप्रैल 2026 तक मिलती रहेगी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने आज बताया कि 28 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारत को एक पत्र भेजकर इस छूट से जुड़े दिशा-निर्देश दिए थे। उन्होंने कहा कि भारत अब इसी तय व्यवस्था के तहत अमेरिका से बातचीत कर रहा है, ताकि चाबहार पोर्ट से जुड़े काम बिना रुकावट आगे बढ़ते रहें।
ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहता है अमेरिका
अमेरिका ने ईरान के चाबहार पोर्ट पर प्रतिबंध इसलिए लगाए क्योंकि वह ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बनाना चाहता है। अमेरिका का मानना है कि ईरान बंदरगाहों, तेल व्यापार और अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं से मिलने वाले पैसों का इस्तेमाल अपने परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल विकास और पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए करता है।
इसी वजह से अमेरिका ईरान की आय के सभी बड़े इनकम सोर्स सीमित करना चाहता है, ताकि उस पर अपनी नीतियां बदलने का दबाव बनाया जा सके। इसके अलावा, अमेरिका 2018 में ईरान के परमाणु समझौते से बाहर निकलने के बाद ‘मैक्सिमम प्रेशर’ पॉलिसी अपना रहा है।
फायदे
बिना पाकिस्तान के रास्ते सेंट्रल एशिया तक पहुंच
- भारत को अफगानिस्तान या दूसरे एशियाई देशों तक सामान भेजने के लिए पाकिस्तान के रास्ते से नहीं जाना पड़ता।
- भारत ईरान के चाबहार पोर्ट से सीधा अपना माल अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया भेज सकता है। इससे समय और पैसा दोनों बचते।
व्यापार बढ़ेगा
- भारत चाबहार के जरिए अपने सामान, दवाएं, फूड और इंडस्ट्रीयल प्रोडक्ट आसानी से दूसरे देशों तक भेज सकता है।
- इससे भारत का एक्सपोर्ट बढ़ेगा और लॉजिस्टिक खर्च (ढुलाई खर्च) कम होगा।
- भारत को ईरान से तेल खरीदने में आसानी होती है। दोनों देश मिलकर चाबहार को एक ट्रेड हब बना सकेंगे।
भारत का निवेश सुरक्षित रहेगा
- भारत ने चाबहार पोर्ट के विकास में काफी पैसा और संसाधन लगाए हैं।
चीन-पाकिस्तान का काउंटर
- चाबहार बंदरगाह, पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जहां चीन निवेश कर रहा है) के नजदीक है।
- इसलिए यह पोर्ट भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाता है और चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को काउंटर करने में मदद करता है।
भारत चाबहार से अफगानिस्तान को जरूरी सामान भेजता है
पहले भारत को अफगानिस्तान माल भेजने के लिए पाकिस्तान से गुजरना पड़ता था, लेकिन सीमा विवाद के कारण यह मुश्किल था। चाबहार ने यह रास्ता आसान बनाया। भारत इस बंदरगाह से अफगानिस्तान को गेहूं भेजता है और मध्य एशिया से गैस-तेल ला सकता है।
2018 में भारत और ईरान ने चाबहार विकसित करने का समझौता किया था। अमेरिका ने इस प्रोजेक्ट के लिए भारत को कुछ प्रतिबंधों में छूट दी थी। यह बंदरगाह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट, जिसे चीन बना रहा है, के मुकाबले भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
पोर्ट के लिए भारत ने अब तक क्या-क्या किया
भारत ने चाबहार बंदरगाह के लिए 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय ईरान से बात शुरू की थी। अमेरिका-ईरान तनाव के कारण यह रुक गया। 2013 में मनमोहन सिंह ने 800 करोड़ रुपए निवेश की बात कही थी।
2016 में पीएम नरेंद्र मोदी ने ईरान और अफगानिस्तान के नेताओं के साथ समझौता किया, जिसमें भारत ने एक टर्मिनल के लिए 700 करोड़ रुपए और बंदरगाह के विकास के लिए 1250 करोड़ रुपए का कर्ज देने की घोषणा की।
2024 में तत्कालीन विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने ईरान के विदेश मंत्री से कनेक्टिविटी पर चर्चा की। भारतीय कंपनी IPGL के मुताबिक, बंदरगाह पूरा होने पर इसकी क्षमता 82 मिलियन टन होगी।

