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अंतरराष्ट्रीय पटल पर छाए जीएलए के प्रोफेसर और छात्र

  • जीएलए के प्रोफेसर और छात्रों के अंतर्राष्ट्रीय शोध को मिली सराहना

मथुरा : जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा के अंग्रेजी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार ने ‘अंतर्राष्ट्रीय भाषाई परिदृश्य परियोजना’ में न हीं सिर्फ सफलता प्राप्त की, बल्कि विश्वविद्यालय के छात्रों को भी भाषाई परिदृश्य पर डेटा संग्रह करने का अवसर दिया। इस अवसर को भुनाने के लिए छात्रों ने इस भाषाई अनुसंधान में काफी उल्लास के साथ प्रतिभाग किया।

जीएलए के अंग्रेजी विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के भाषाविज्ञान विभाग से 2016 में प्रोफेसर इम्तियाज हसनैन के कुशल निर्देशन में पीएचडी (भाषाविज्ञान) की उपाधि प्राप्त की है। डॉ. विवेक ने बताया कि वह गत ढाई वर्षों से नॉर्थईस्टर्न इलिनोइस विश्वविद्यालय, शिकागो, यूएसए एवं यूनिवर्सिटी आफ कैलिगरी, इटली के प्रमुख अन्वेषक प्रोफेसर रिचर्ड डब्ल्यू हेलैट एवं प्रोफेसर ओल्गा डेंटी के नेतृत्व में तीन विश्वविद्यालयों के अंतर्गत बहुविश्वविद्यालय भाषाई परिदृश्य परियोजना में अन्वेषक के रूप में शोधकार्य कर रहे हैं।

वह इस शोधकार्य का श्रेय अपनी टीम को देना चाहते हैं। उनकी टीम में बीटेक इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र आयुष माधौरिया, डिप्लोमा इन मैकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र निखिल शर्मा एवं अन्य छात्रों ने विभिन्न परिदृश्यो से डाटा एकत्रित कर अपना अहम योगदान दिया है। इस बहुविश्वविद्यालय परियोजना में जीएलए विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता, अंग्रेजी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. पंचानन मोहंती, सहविभागाध्यक्ष डॉ. रामांजनेय कुमार उपाध्याय एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व डीन (कला संकाय) प्रोफेसर इम्तियाज हसनैन ने संबंधित क्षेत्र में अपना उचित मार्गदर्शन कर प्रोत्साहित किया है।

विदित रहे कि भारतीय भाषाई संपदा बहुत ही विविध एवं समृद्ध है, जो देश के इतिहास और सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। हमारा देश संस्कृत भाषा के अलावा, हिंदी, बंगाली, तेलुगु, तमिल, मराठी, उर्दू, गुजराती, कन्नड़, पंजाबी और कई अन्य आधुनिक भाशा और बोलियों का घर है, जो कि दुनिया के सबसे भाषाई रूप से विविध देशों में से एक है। भारतीय उपमहाद्वीप में प्राचीन काल से भाषाई शोध का एक लंबा इतिहास एवं परंपरा रही है। महर्षि पाणिनि इसका एक आदर्श उदाहरण हैं, जो कि व्याकरण के पिता कहे जाते हैं। इनमें से प्रत्येक भाषा का अपना अनूठा व्याकरण, शब्दावली और लेखन प्रणाली है, जो लाखों लोगों द्वारा बोली जाती है। हाल ही के वर्षों में भारत ने भाषाविज्ञान के अध्ययन में बढ़ती दिलचस्पी देखी है। कई विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों ने भारतीय भाषाओं और भाषाविज्ञान पर शोध किया है।

वर्तमान में जीएलए के प्रोफेसर और छात्रों ने अपने अध्ययन में पाया कि भाशाई परिदृष्य पर भाषाई विविधता न केवल प्रदर्शित होती है बल्कि, इसका प्रतिस्पर्धा एवं विरोध भी दिखता है। कुछ भाषा समूहों के पास दूसरों की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र में लिखित प्रदर्शन पर अधिक पहुंच है। बहुसंख्यक भाषाएं हावी दिखी हैं, लेकिन अल्पसंख्यक भाषाएं अक्सर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिखीं हैं। यह विभिन्न समाजशास्त्रीय प्रक्रियाओं के परिणाम को दर्शाता है। छात्रों ने अपने अध्ययन में पाया कि ‘हिंदी आज कार्यस्थल पर महज सजावट के रूप में प्रयोग हो रही है’, परियोजना के कई परिणामों में यह एक रोचक परिणाम की तरह दिखी है। इस अध्ययन ने भाषा विविधता और बहुभाषायिकता के कई अभिनव और मनोरम को दृष्टिकोण से जोड़ा है।

डाॅ. विवेक ने बताया कि भाशाई परिदृष्य प्रोजेक्ट पर किए गए श्रेश्ठ कार्य से खुष होकर नॉर्थईस्टर्न इलिनोइस विश्वविद्यालय, शिकागो, यूएसए और यूनिवर्सिटी आफ कैलिगरी, इटली ने सराहनीय पत्र जारी किया है। इस सराहनीय पत्र को पाकर प्रोफेसर और छात्र काफी उत्साहित हैं। डीन रिसर्च प्रो. कमल षर्मा ने बताया कि अंतरराश्ट्रीय स्तर पर चल रहे प्रोजेक्ट पर कार्य हेतु जीएलए प्रोफेसर का चयनित होना विष्वविद्यालय के लिए बड़ी उपलब्धि है। इसके साथ ही बेहतर कार्य हेतु प्रषंसनीय पत्र मिलना भी छात्रों की बेहतर षिक्षा का प्रमाण है।

नॉर्थईस्टर्न इलिनोइस विश्वविद्यालय, शिकागो, यूएसए के प्रोफेसर रिचर्ड ने बताया कि उनके विश्वविद्यालय में ‘सीओआईएल‘ नामक ‘अंतर्राष्ट्रीय सहयोगात्मक ऑनलाइन शिक्षण एवं शोध परियोजना’ है, जो कि काफी नई है एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन सहयोगात्मक शोध परियोजना के लिए विशिष्ट है। वर्तमान में इस बहुविश्वविद्यालय शोध परियोजना के अध्ययन व शोध-पत्र पर कार्य चल रहा है।

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