- सुप्रीम कोर्ट ने देश में चल रही मुफ्त योजनाओं को लेकर राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई है
नई दिल्ली : सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्यों की राजनीतिक पार्टियों द्वारा मुफ्त योजनाओं के वितरण की कड़ी आलोचना की है और सार्वजनिक वित्त पर इसके प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने कहा है कि राजनीतिक पार्टियों को मुफ्त योजनाओं के माध्यम से संसाधन वितरित करने के बजाय, ऐसी सुनियोजित नीतियां बनानी चाहिए जिनसे लोगों के जीवन स्तर में सुधार हो सके, जैसे कि बेरोजगारी भत्ता योजनाएं। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “इस तरह के फिजूलखर्ची से देश का आर्थिक विकास बाधित होगा। हां, यह राज्य का कर्तव्य है कि वह संसाधन उपलब्ध कराए। लेकिन जो लोग मुफ्त योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं… क्या इस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है?”
मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, “राज्य घाटे में चल रहे हैं, फिर भी मुफ्त योजनाएं दे रहे हैं। देखिए, आप एक वर्ष में जो राजस्व एकत्र करते हैं उसका 25 प्रतिशत राज्य के विकास के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल किया जा सकता?” न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के सभी राज्यों से संबंधित है। “हम किसी एक राज्य की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि सभी राज्यों की बात कर रहे हैं। यह नियोजित व्यय है। आप बजट प्रस्ताव क्यों नहीं पेश करते और यह स्पष्टीकरण क्यों नहीं देते कि यह बेरोजगारी से जूझ रहे लोगों पर मेरा व्यय है?” न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने आगे कहा।
विकास बनाम लोकलुभावन नीतियां
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। अदालत का मानना है कि जनता को सशक्त बनाने और उन्हें मुफ्त की चीजें देकर उन पर निर्भर बनाने के बीच एक बड़ा अंतर है। सही मायने में आर्थिक विकास तब होता है जब रोजगार के अवसर पैदा हों और आधारभूत सुविधाएं मजबूत हों, न कि सिर्फ चुनाव जीतने के लिए सरकारी खजाने को खाली कर दिया जाए। यह टिप्पणी देश की राजनीति में दूरगामी बदलाव ला सकती है।
आर्थिक विशेषज्ञों और आम जनता की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद आर्थिक विशेषज्ञों और आम जनता की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। अर्थशास्त्रियों ने अदालत के इस रुख का स्वागत किया है और कहा है कि इससे राज्यों को कर्ज के जाल में फंसने से बचाया जा सकेगा। वहीं, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘मुफ्त उपहार’ और ‘गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाओं’ के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए, ताकि जरूरतमंदों को नुकसान न हो।
सबकी निगाहें चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के अगले कदम पर
इस मामले में अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आयोग राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों (Manifestos) में मुफ्त वादों को लेकर कोई सख्त नियम लागू करता है या नहीं। अदालत ने एक विशेषज्ञ समिति बनाने का भी सुझाव दिया है जो इस पूरे मुद्दे का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।
‘कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाम मुफ्त की रेवड़ियां (Freebies)’ की बहस
इस खबर का सबसे बड़ा साइड एंगल ‘कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाम मुफ्त की रेवड़ियां (Freebies)’ की बहस है। भारत जैसे विकासशील देश में जहां एक बड़ा वर्ग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करता है, वहां शिक्षा, राशन और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं देना सरकार की जिम्मेदारी है। चुनौती यह तय करने की है कि कौन सी योजना वास्तविक ‘कल्याण’ है और कौन सी महज वोट बैंक के लिए ‘रिश्वत’।

