जयपुर : सुप्रीम कोर्ट ने पैरोल के आदेश के बाद भी एक कैदी को 24 दिन तक जेल में रखने के मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पीड़ित को 11 लाख रुपए का मुआवजा देने के आदेश दिए हैं।
हाईकोर्ट से पैरोल के आदेशों के बावजूद कैदी को रिहा करने में 24 दिन की देरी को अवैध रूप से हिरासत में रखना माना गया है। जस्टिस संजय करोल और अगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने दाऊदयाल बनाम राजस्थान सरकार के मामले में 29 मई को यह फैसला सुनाया है।
प्रशासनिक लेटलतीफी पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणियां की। कोर्ट ने साफ किया कि कोई व्यक्ति दोषी है, केवल इसलिए उसके मानवाधिकार कम नहीं हो जाते। प्रशासनिक देरी किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन नहीं कर सकती।
कोर्ट ने जेल से रिहाई में देरी के पीछे राज्य सरकार का यह तर्क खारिज कर दिया कि वे आदेश को चुनौती देने पर विचार कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जब तक ऊपरी अदालत से स्टे नहीं मिले, तब तक अदालत के आदेश का पालन करना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट से पैरोल के आदेश के बावजूद 24 दिन जेल में रखा
अपीलकर्ता दाऊदयाल को अलवर की कोर्ट ने साल 1988 के गैर इरादतन हत्या केस में 4 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। अपील खारिज होने के बाद 23 दिसंबर 2021 को गिरफ्तार किया गया, तब से लेकर वह जेल में था।
3 दिसंबर 2023 को स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया था। 18 जनवरी 2024 को खारिज कर दिया गया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट की सिंगल बैंच ने 5 नवंबर 2024 को 1 लाख रुपए के निजी मुचलके और 50 हजार रुपए के जमानती पेश करने पर रिहा करने का आदेश दिया था।
प्रशासनिक लापरवाही से पैरोल के बावजूद जेल में रहा
हाईकोर्ट के आदेशों तक अपीलकर्ता कुल 4 साल की सजा में से 3 साल 2 महीने और 20 दिन की सजा काट चुका था। उसकी 9 महीने 10 दिन की सजा बाकी थी। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच के 5 नवंबर 2024 के आदेशों के बावजूद उसे रिहा नहीं किया गया।
जमानतदारों के दस्तावेजों का वेरिफिकेशन और जरूरी कागजी औपचारिकताएं 13 नवंबर 2024 को पूरी हो गई थी, लेकिन रिहा नहीं किया गया। इसके बाद डिवीजन बेंच में अपील की गई। डिवीजन बेंच के आदेश पर 6 दिसंबर 2024 को रिहा किया गया। इस तरह अपीलकर्ता को हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी 24 दिन तक अवैध रूप से जेल में बंद रखा गया।
बिना प्रावधान किसी की स्वतंत्रता छीनना अवैध हिरासत
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध हिरासत की परिभाषा को लेकर भी टिप्पणियां की। कोर्ट ने कहा कि बिना कानूनी अधिकार या संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन में किसी की स्वतंत्रता छीनना ही अवैध हिरासत है। अवैध हिरासत को लेकर अलग अलग परिभाषाओं का भी जिक्र किया गया है।
कैदी को रिहा करने के आदेश का पालन करना अनिवार्य, चाहे कुछ हो जाए
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा- अपीलकर्ता 24 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे जाने के लिए मुआवजे का हकदार है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कोई छोटा मुद्दा नहीं है। राज्य किसी कोर्ट के आदेश के बावजूद, किसी विशेष मामले में अपील दायर करने या न करने के बारे में फैसले लेने की अपनी धीमी ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रियाओं के कारण किसी व्यक्ति की आजादी को सीमित नहीं कर सकता। एक बार जब कैदी को रिहा करने का आदेश दे दिया गया है तो उसका पालन करना अनिवार्य है, चाहे कुछ भी हो जाए।

