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Wed. Mar 4th, 2026

दिल्ली-चंडीगढ़ NH पर आर-पार के मूड में किसान, टिकैत बोले- MSP मिले या फिर जेल

नई दिल्ली : हरियाणा में सूरजमुखी पर MSP को लेकर राज्य सरकार और किसान संगठन आमने-सामने हैं। कुरुक्षेत्र में किसानों ने सोमवार दोपहर 2 बजे से दिल्ली- चंडीगढ़ नेशनल हाईवे-44 को जाम कर रखा है। जिससे आने जाने वालों को परेशानी हो रही है। रुट को बदला गया है। किसानों ने हाईवे पर ही रात भी गुजारी। संयुक्त किसान मोर्चा का हरियाणा की खट्टर सरकार को सुबह 10 बजे के दिए गए अल्टीमेटम का समय समाप्त हो गया। इसके बाद किसानों ने हाईवे पर तंबू गाड़ दिए हैं। किसानों की इस बार दो मांग है- एक सूरजमुखी पर MSP की घोषणा की जाए और दूसरा जेल में बंद किसान नेता गुरनाम चढ़ूनी समेत अन्य किसान नेताओं को रिहा किया जाए।

बता दें कि, तीन राज्यों के प्रदर्शनकारी किसान कल सोमवार दोपहर 2 बजे से ही नेशनल हाईवे-44 पर डेरा डाले हुए हैं। कल सरकार के प्रतिनिधि और किसानों के बीच हुई बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकला था। सरकार ने किसानों को समझाने के लिए अपने बड़े-बड़े अधिकारियों को लगा रखा है। लेकिन प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है की जब तक एमएसपी पर सरकार खरीदारी शुरू नहीं करेगी, तब तक ये प्रदर्शन नहीं हटेंगे । देशभर के करीब 40 किसान संगठन सरकार के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं और सभी की एक ही मांग है।

कुरुक्षेत्र में राकेश टिकैत सख्त तेवर में नजर आ रहे हैं। सरकार के खिलाफ उन्होंने जमकर हमला किया। उन्होंने कहा कि एमएसपी मिले या फिर जेल, यह तभी जाम खुलेगा। टिकैत बोले कि मोदी सरकार भारत देश को उत्तर-कोरिया बनाने पर तूली है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र पर हर तरीके से हमला किया जा रहा है। देश भर में किसानों की दुर्दशा हो रही है, इसके लिए सर्कार कोई कदम नहीं उठा रही, लेकिन इस बारये आंदोलन एमएसपी लेकर रहेगा।

क्या होता है न्यूनतम समर्थन मूल्य

न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price ) यानी MSP वो मूल्य होती है जिसे सरकार फसलों के लिए तय करती है। जब किसान फसल को मंडी में बेचता है तो सरकार की तरफ़ से तय की हुई क़ीमत किसानों को मिलती है। दरअसल एमएसपी सरकार द्वारा किसानों को दिया जाने वाला एक आर्थिक भरोसा है। जिससे किसानों को फसल उगाने से पहली उसकी क़ीमत का अंदाज़ा हो जाता है कि उसे इस फसल की कितनी क़ीमत मिलेगी।

बाजार में मांग और सप्लाई को आसान बनाने के लिए किसान के फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय की जाती है, ताकि कुछ भी हो उस किसान को उस फसल के लिए कम से कम इतनी रकम तो मिलेगी ही। वरना पहले के समय में देखा जाता था की फसल ख़राब होने पर उनकी सारी मेहनत पर पानी फिर जकता था। चाहे वो किसी आपदा के कारण ही क्यों न हुआ हो।

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