Breaking
Sat. May 16th, 2026

जीएलए का बायोटेक विभाग बना शोध और नवाचार का केंद्र

  • जीएलए का बायोटेक प्रयोगशालाओं और अनुसंधान कार्यों के कारण विद्यार्थियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र

दैनिक उजाला, मथुरा : विज्ञान और आधुनिक प्रौद्योगिकी के तेजी से बदलते दौर में जीएलए यूनिवर्सिटी का जैव प्रौद्योगिकी विभाग विद्यार्थियों को केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि शोध, नवाचार और वैश्विक स्तर की वैज्ञानिक सोच से भी जोड़ रहा है। एडमिशन सत्र के बीच विश्वविद्यालय का बायोटेक विभाग अपनी अत्याधुनिक “पौध ऊतक संवर्धन प्रौद्योगिकी” आधारित प्रयोगशालाओं और अनुसंधान कार्यों के कारण विद्यार्थियों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन गया है।

बढ़ती जनसंख्या, सीमित कृषि भूमि, जलवायु परिवर्तन और पौधों में बढ़ते रोगों जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच “पौध ऊतक संवर्धन प्रौद्योगिकी” कृषि और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई क्रांति ला रही है। इसी आधुनिक तकनीक पर आधारित अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्य जीएलए यूनिवर्सिटी के जैव प्रौद्योगिकी विभाग में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यहां विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि उन्हें अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं में वास्तविक शोध और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं से भी जोड़ा जाता है।

विभाग की प्रयोगशालाओं में पौधों की सूक्ष्म कोशिकाओं, पत्तियों, जड़ों और तनों को विशेष पोषक माध्यम में विकसित कर नए पौधों का निर्माण किया जा रहा है। इस प्रक्रिया से रोगमुक्त, उच्च गुणवत्ता वाले और तेजी से विकसित होने वाले पौधे तैयार किए जाते हैं, जो भविष्य में खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सतत कृषि विकास के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकते हैं।

विभाग के विशेषज्ञ शिक्षकों—डॉ. प्रदीप चौधरी, डॉ. अनुकूल वैष्णव, डॉ. अर्जुन सिंह चौहान, डॉ. गौरव सिंह एवं डॉ. खुशबू दसौनी—के मार्गदर्शन में विद्यार्थी आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी की उन्नत तकनीकों, रिसर्च पद्धतियों और प्रयोगात्मक कौशल को सीख रहे हैं। विभाग में विकसित अनुसंधान वातावरण छात्रों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचार क्षमता और तकनीकी दक्षता प्रदान कर रहा है, जिससे वे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकें।

विशेष रूप से असिस्टेंट प्रो. डॉ. खुशबू दसौनी का शोध कार्य विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। उन्होंने कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल, उत्तराखंड से जैव प्रौद्योगिकी में पीएचडी की है तथा उत्तराखंड की विशेष हिमालयी प्रजाति कैनाबिस सैटिवा पर माइक्रोप्रोपेगेशन प्रोटोकॉल विकसित किया है। उनके शोध में नैनोकणों की सहायता से पौधों की वृद्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता और औषधीय गुणों को बेहतर बनाने पर कार्य किया गया। इस महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें उत्तराखंड सरकार द्वारा लाइसेंस एवं “युवा वैज्ञानिक” सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

शोध और नवाचार के क्षेत्र में नई दिशा

असिस्टेंट प्रो. डॉ. गौरव सिंह फ्रांस के प्रतिष्ठित शोध संस्थानों सीएनआरएस–इंस्टीट्यूट डी बायोलॉजी मॉलिक्यूलर डेस प्लांट्स तथा एक्स-मार्सेई इंस्टीट्यूट ऑफ बायोसाइंसेज एंड बायोटेक्नोलॉजीज में पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त डॉ. अनुकूल वैष्णव ने यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिख और चेक एकेडमी ऑफ साइंसेज जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में शोध कार्य किया है। इन शिक्षकों का वैश्विक अनुभव विभाग को शोध और नवाचार के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान कर रहा है।

आज केला, आलू, गन्ना, स्ट्रॉबेरी, अंगूर, सेब, अनार, ब्लूबेरी, ऑर्किड और अनेक औषधीय पौधों का उत्पादन बड़े स्तर पर इसी प्रौद्योगिकी के माध्यम से किया जा रहा है। यह तकनीक कम समय में बड़ी संख्या में पौध तैयार करने, दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण, रोगमुक्त फसलों के विकास तथा कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

विभागाध्यक्ष प्रो. शूरवीर सिंह के अनुसार, जैव प्रौद्योगिकी और पौध ऊतक संवर्धन का क्षेत्र आने वाले समय में रोजगार, अनुसंधान और उद्योगों के लिए अपार संभावनाएं लेकर आ रहा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल शिक्षा देना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा वैज्ञानिक बनाना है जो समाज, कृषि और पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं का समाधान खोज सके।
जीएलए यूनिवर्सिटी का जैव प्रौद्योगिकी विभाग आज उन युवाओं के लिए बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है, जो रिसर्च, हेल्थ साइंस, फार्मा, कृषि, पर्यावरण और बायोटेक इंडस्ट्री में करियर बनाना चाहते हैं। यहां विद्यार्थी प्रयोगशाला में वास्तविक अनुसंधान अनुभव प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास, वैज्ञानिक सोच और नवाचार क्षमता का विकास हो रहा है।

निश्चित रूप से, “पौध ऊतक संवर्धन तकनीक” केवल एक वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भविष्य की हरित और आत्मनिर्भर दुनिया की मजबूत नींव है। जीएलए यूनिवर्सिटी की यह पहल आने वाले वर्षों में कृषि, खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ-साथ युवाओं के लिए नए अवसरों के द्वार खोल रही है।

Related Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *