चित्तौड़गढ़ : एक बंदर की मौत पर सैकड़ों लोग रोने लगे। उनका दावा है कि वो हनुमानजी का स्वरूप था। बंदर की शवयात्रा निकली तो लोग अंतिम दर्शनों के लिए उमड़ पड़े। उसकी अंतिम विधि में मुंडन, पगड़ी दस्तूर और पिंडदान जैसी परंपराएं भी निभाई गईं। मामला जिले के भदेसर क्षेत्र के धीरजी का खेड़ा गांव का है।
ग्रामीणों ने बताया कि ये बंदर दो साल से खाकल देवजी के मंदिर में रहता था। इसने कभी गांव के किसी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाया। बंदर की मौत श्राद्ध पक्ष के पहले दिन यानी रविवार 7 सितंबर को हुई थी।
जैसे ही गांव में यह खबर फैली, पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों ने तुरंत निर्णय लिया कि इस बंदर का अंतिम संस्कार पूरी वैदिक विधियों से किया जाएगा।

बंदर की अर्थी निकाली गई, जिसमें ढोल-ताशे बजते रहे। गांव के कई लोग इस अंतिम यात्रा में शामिल हुए। कई लोग रोते हुए उसके सामने हाथ जोड़कर खड़े थे, जैसे कोई अपना उन्हें छोड़कर जा रहा हो।
यह दृश्य देखकर हर किसी की आंखें नम हो गईं। बंदर को अंतिम बार उसी मंदिर के सामने ले जाया गया जहां वह रोज बैठा करता था और इसके बाद वैदिक मंत्रों के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।

ग्रामीणों ने बताया कि बंदर को अंतिम प्रणाम करने के दौरान लोगों की आंखों में आंसू थे।
कराया मुंडन
ग्रामीणों का कहना है कि ये बंदर उनके परिवार का सदस्य था। उसकी व्यवहार भी इंसानों से अलग था। उसका जाना उनके लिए काफी दुख की बात है। गांव के 11 हनुमान भक्तों ने मुंडन संस्कार भी कराया। यह वही विधि है जो किसी इंसान की मौत पर हिंदू समाज में की जाती है। इन्हीं 11 लोगों ने बंदर का पिंडदान भी किया।
धार्मिक स्थल पर किया गया बंदर का पिंडदान
अस्थियों को 8 सितंबर को मातृकुंडिया में विधिपूर्वक विसर्जित किया गया। इसके बाद गांव में पगड़ी की रस्म भी निभाई गई। इसके बाद गांव में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। इस आयोजन में लगभग 900 लोग शामिल हुए। गांव के हर घर को निमंत्रण दिया गया था।

अंतिम क्रिया की सभी विधि में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे। उनका कहना था कि ये काफी भावुक पल था।
दो साल पहले आया था मंदिर, आरती में होता था शामिल
गांव के बंटी सिंह और अन्य ग्रामीणों ने बताया कि यह बंदर कोई सामान्य बंदर नहीं था। उसकी दिनचर्या और व्यवहार ऐसा था कि वह सबका प्रिय बन गया था।
पहले तो वह मंदिर के आसपास ही रहता था, लेकिन धीरे-धीरे मंदिर में आने वाले ग्रामीणों से घुलने-मिलने लगा। गांव के लोग जब मंदिर में पूजा या आरती के लिए आते थे, तो वह बंदर भी वहां आकर बैठ जाता था।
वह पूरी श्रद्धा और शांति से लोगों के साथ आरती में भाग लेता था। कई बार वह श्रद्धालुओं की गोद में बैठ जाता, बच्चों के साथ खेलता और बड़े बुजुर्गों के पास जाकर बैठ जाता था। उसका व्यवहार इतना शांत, सरल और दोस्ताना था कि किसी को उस पर कभी गुस्सा नहीं आया।

बंदर की मौत पर गांव में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया। इस आयोजन में लगभग 900 लोग शामिल हुए।

