मथुरा : ब्रज के विरक्त संत पद्म श्री रमेश बाबा का मंगलवार को गोलोक वास हो गया। गौ सेवा,यमुना आंदोलन और ब्रज की पहाड़ियों को बचाने के लिए बाबा ने कई बार प्रदर्शन किए थे। बाबा के निधन से उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई। बाबा 90 साल के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। बाबा का अंतिम संस्कार कब होगा इसको लेकर अभी कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
90 वर्ष के पद्म श्री रमेश बाबा बरसाना के गहवर वन में स्थित मान मंदिर में रहते थे। बाबा का जन्म 1938 में प्रयागराज में हुआ था। ज्योतिषाचार्य पिता ने उसी समय बता दिया था कि यह भगवान की भक्ति करेगा। इसके बाद 1953 में रमेश बाबा 15 साल की उम्र में ब्रज आ गए। इसके बाद वह लगातार राधा रानी की भक्ति करने लगे।

1953 में रमेश बाबा 15 साल की उम्र में ब्रज आ गए
बाबा ने सबसे पहले बड़ा आंदोलन ब्रज की पहाड़ियों को बचाने के लिए किया था। बरसाना और उसके आसपास राजस्थान में मौजूद पहाड़ियों पर खनन तेजी से चल रहा था। जिससे ब्रज की पहाड़ी और वृक्ष खत्म होने के कगार पर पहुंच गए थे। जिसके बाद उन्होंने 2002 में आंदोलन की शुरुआत की। यह आंदोलन करीब 8 साल चला। इस दौरान उन पर कई बार हमले भी किए गए।

रमेश बाबा ने 90 साल की उम्र में अंतिम सांस ली
यमुना शुद्धिकरण को लेकर की थी पदयात्रा
पद्म श्री रमेश बाबा ने बदहाल हो चुकी यमुना को शुद्ध करने के लिए भी अभियान चलाया था। बाबा ने वृंदावन से दिल्ली तक 2013 में ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की। जिसमें 50 हजार से ज्यादा लोग पदयात्रा में शामिल हुए थे। शांतिपूर्ण यात्रा हाईवे से होते हुए दिल्ली के लिए निकली थी। यात्रा दिल्ली पहुंची उससे पहले तत्कालीन सरकार ने यमुना शुद्धिकरण के लिए एक बड़ा प्लान बनाने का आश्वासन दिया था।

रमेश बाबा की माताजी गौशाला में 50 हजार से ज्यादा गौवंश है
माताजी गौशाला में हैं 50 हजार से ज्यादा गौशाला
रमेश बाबाजी महाराज का मुख्य कार्य गायों की सेवा और आश्रय प्रदान करना है। उन्होंने बरसाना में माताजी गौशाला की स्थापना की, जिसकी शुरुआत 2007 में हुई थी। यह संस्था घायल, बीमार या परित्यक्त गायों को बचाने और उन्हें आश्रय, भोजन और चिकित्सा देखभाल प्रदान करने पर केंद्रित है। यह आश्रय स्थल हजारों गायों की देखभाल करता है, जिससे यह भारत के सबसे बड़े आश्रय स्थलों में से एक बन गया है। यह आश्रय स्थल गोबर का उपयोग करके एक बड़ा बायोगैस संयंत्र भी संचालित करता है। यहां वर्तमान में 50 हजार से ज्यादा गौवंश है।

