उन्नाव : यूपी विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना का राष्ट्रगान बीच में छोड़कर जाने का वीडियो सामने आया है। उन्नाव में शनिवार को कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने प्रोटोकॉल के तहत महाना को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। इसके तुरंत बाद राष्ट्रगान शुरू हुआ।
सतीश महाना ने चलते राष्ट्रगान में ही तिरंगे को सलामी दी, हाथ जोड़ा और मंच के पीछे की ओर उतर गए। कुछ दूरी पर खड़े समर्थक भी उनके पास पहुंचे और पैर छूने लगे। इसके बाद महाना कार में बैठे और वहां से रवाना हो गए।
मामला पूरन नगर के एक स्कूल का है। जहां महाना प्रधानाचार्य परिषद के अधिवेशन और शैक्षिक संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे थे। वीडियो रविवार को सामने आया। कार्यक्रम आयोजकों ने दैनिक भास्कर से कहा- जिस जगह सतीश महाना मौजूद थे, राष्ट्रगान वहां से काफी दूर बज रहा था।

गार्ड ऑफ ऑनर के दौरान सतीश महाना ने सलामी दी और मंच से उतरकर चल पड़े।

समर्थकों ने महाना के पैर छुए। इसके बाद महाना कार में बैठे और वहां से रवाना हो गए।
कार्यक्रम में 40 मिनट रहे, बोले- संस्थान मजबूत होंगे तो देश मजबूत होगा
सतीश महाना शनिवार शाम करीब 4 बजे एसवीएम इंटर कॉलेज के आस्था सभागार पहुंचे। वे करीब 40 मिनट तक कार्यक्रम में रहे। इस दौरान ‘शिक्षा प्रभा’ किताब का विमोचन भी किया।
महाना ने प्रधानाचार्यों और शिक्षाविदों से ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपील की। कहा कि शिक्षा संस्थान देश के विकास की नींव हैं। अगर संस्थान मजबूत होंगे, तो देश मजबूत होगा।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर के लिए दी गई राशि भगवान के चरणों में समर्पित है। इसे वापस मांगने की बात आस्थावानों को दुख पहुंचाने वाली है।

सतीश महाना ने शिक्षा प्रभा’ पुस्तक का विमोचन भी किया।
कांग्रेस नेता ने पूछा- क्या यह राष्ट्रगान का अपमान नहीं?
उन्नाव कांग्रेस कमेटी के नेता दिनेश शुक्ला ने आरोप लगाया कि विधानसभा अध्यक्ष ने प्रोटोकॉल के तहत गार्ड ऑफ ऑनर लिया और राष्ट्रगान के दौरान वहां से चले गए। उन्होंने सवाल किया- क्या यह राष्ट्रगान का अपमान नहीं है?

सतीश महाना ने कहा- शिक्षा संस्थान देश के विकास की नींव हैं। अगर देश के संस्थान मजबूत होंगे, तो देश भी मजबूत होगा।
मानसून सत्र में पद छोड़ने की चेतावनी दी थी
5 अगस्त को विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान सतीश महाना ने पद छोड़ने की चेतावनी दी थी। सपा के हंगामे पर उन्होंने कहा था- मेरे मन में पीड़ा है। मुझे पहली बार लगा कि या तो हमारे प्रयास में कहीं कमी रह गई या फिर डॉ. अंबेडकर की बात सही है कि कमी संविधान में नहीं, व्यक्तियों में होती है।
उन्होंने कहा था- मेरी लंबी राजनीतिक पारी अब अंतिम चरण में है। मुझे गंभीरता से विचार करना पड़ेगा कि पिछले साढ़े चार साल में जो किया, वह उचित था या अनुचित। मैं इस कुर्सी के योग्य हूं या नहीं, इस पर भी विचार करूंगा और जल्द निर्णय लूंगा।

