- आचार्य वराहमिहिर के खगोलीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ने पर होगा राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन
दैनिक उजाला, मथुरा: जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा ने शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि अपने नाम की है। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. धर्मवीर सिंह के शोध प्रस्ताव आचार्य वराहमिहिर का खगोल विज्ञान शास्त्रीय गणना से आधुनिक आँकड़ा विश्लेषण तक को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) प्रभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति प्रदान की गई है।
यह शोध भारत के महान खगोल शास्त्री आचार्य वराहमिहिर द्वारा प्रतिपादित खगोलीय सिद्धांतों, ग्रह-नक्षत्रों की गणना, समय निर्धारण तथा गणितीय पद्धतियों का आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करेगा। शोध में प्राचीन भारतीय ज्ञान को कंप्यूटर, विश्लेषण, तथा आधुनिक वैज्ञानिक गणना के साथ जोड़कर यह समझने का प्रयास किया जाएगा कि हजारों वर्ष पूर्व विकसित भारतीय वैज्ञानिक ज्ञान आज के युग में किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकता है।



इस परियोजना में डॉ. धर्मवीर सिंह मुख्य अन्वेषक, डॉ. आशुतोष सिंह सह-अन्वेषक तथा डॉ. मुकुंद कुमार मिश्रा सहयोगी शोधकर्ता के रूप में कार्य करेंगे। शोध के दौरान संस्कृत ग्रंथों में वर्णित खगोलीय सिद्धांतों का वैज्ञानिक परीक्षण, तथा आधुनिक आँकड़ों से तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित प्रमाणिक शोध सामग्री तैयार होगी, जिसका उपयोग विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों तथा वैज्ञानिक समुदाय द्वारा किया जा सकेगा। शोध परियोजना के लिए ₹2.25 लाख का शोध अनुदान (रिसर्च ग्रांट) भी स्वीकृत किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस शोध से भारतीय पंचांग, ग्रहों की गति, समय निर्धारण तथा प्राचीन गणना पद्धतियों की वैज्ञानिक उपयोगिता पर नए तथ्य सामने आ सकते हैं। भविष्य में यह अध्ययन भारतीय ज्ञान प्रणाली, अंतरिक्ष विज्ञान, गणित, और आँकड़ा विज्ञान जैसे क्षेत्रों में नए अनुसंधानों का आधार बन सकता है। साथ ही भारत की वैज्ञानिक विरासत को वैश्विक मंच पर प्रमाणिक रूप से स्थापित करने में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
जीएलए के डीन रिसर्च प्रो. कमल शर्मा ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, यह उपलब्धि केवल डॉ. धर्मवीर सिंह और उनकी टीम की ही नहीं, बल्कि जीएलए विश्वविद्यालय की सुदृढ़ शोध संस्कृति का परिणाम है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य ऐसे शोधों को प्रोत्साहित करना है जो भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जोड़कर समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी समाधान प्रस्तुत करें। हमें विश्वास है कि यह परियोजना भारतीय खगोल विज्ञान के वैश्विक अध्ययन में नए आयाम स्थापित करेगी तथा युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा बनेगी”।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस उपलब्धि को संस्थान की बढ़ती शोध क्षमता का प्रमाण बताते हुए कहा कि जीएलए विश्वविद्यालय लगातार राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है। भारत सरकार द्वारा इस परियोजना को मिली स्वीकृति न केवल विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है, बल्कि यह भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्व पटल पर स्थापित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता ने कहा, डॉ. धर्मवीर सिंह और उनकी टीम की यह उपलब्धि विश्वविद्यालय की शोध उत्कृष्टता और अकादमिक प्रतिबद्धता का प्रमाण है। भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने वाले ऐसे शोध देश की बौद्धिक संपदा को समृद्ध करते हैं। हमें विश्वास है कि यह परियोजना न केवल नए शोध आयाम स्थापित करेगी, बल्कि युवा शोधकर्ताओं को भी मौलिक अनुसंधान के लिए प्रेरित करेगी।
कुलसचिव अशोक कुमार सिंह ने कहा, भारत सरकार द्वारा इस शोध परियोजना को मिली स्वीकृति विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है। जीएलए विश्वविद्यालय में ऐसा शैक्षणिक वातावरण विकसित किया जा रहा है, जहाँ शोध का उद्देश्य केवल ज्ञान का विस्तार नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप नवाचार को बढ़ावा देना है। यह उपलब्धि विश्वविद्यालय की अनुसंधान संस्कृति को और अधिक सशक्त बनाएगी।

