नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने कहा कि सरकारें हमेशा उन जजों को पसंद करती रही हैं, जो उनके विचारों से सहमत होते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए मजबूती से खड़ा रहना चाहिए।
जस्टिस कौल ने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के जजों की नियुक्ति के तरीके की आलोचना की। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम को स्वतंत्र रूप से फैसले लेने चाहिए और सरकार से पहले ही मंजूरी लेने से बचना चाहिए। उन्होंने ये बातें अपनी आगामी किताब ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ को लेकर चर्चा के दौरान कहीं।
जस्टिस कौल ने कहा कि वह कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास को मेंटर नहीं कर रहे थे। वह उनसे एक पत्रकार के रूप में केवल कुछ बार मिले थे और उन्हें अपनी भाषा में थोड़ा संयम बरतने की सलाह दी थी, जो कि अक्सर पीढ़ियों के बीच अलग-अलग होती है।
अनुच्छेद 370 हटाने पर: अनुच्छेद 370 हटाने के मामले में उन्होंने कश्मीरी हिंदू के बजाय संवैधानिक जज के रूप में फैसला दिया। दिसंबर 2023 में वह उस पांच जजों की पीठ का हिस्सा थे, जिसने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा।
जम्मू-कश्मीर में हिंसा पर: जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं को स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए निष्पक्ष सत्य एवं सुलह आयोग बनाने का सुझाव दिया। पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है।
राफेल विमान सौदे पर: उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि रक्षा सौदों में अदालत सरकार के फैसलों की जगह अपना फैसला नहीं थोप सकती।
सौरभ कृपाल के नाम की सिफारिश अक्टूबर 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट और नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की थी। नवंबर 2022 में केंद्र सरकार ने इस सिफारिश पर आपत्ति जताते हुए फाइल वापस भेज दी। इसके बाद जनवरी 2023 में कॉलेजियम ने दोबारा उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन नियुक्ति नहीं हो सकी।
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़: पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध थे, लेकिन जजों की नियुक्ति के मामले में उनकी सोच अलग थी। चंद्रचूड़ कई बार सरकार के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखने में नरम पड़ जाते थे।
जजों की नियुक्ति पर: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति जल्द होनी चाहिए, ताकि योग्य वकील यह जिम्मेदारी स्वीकार करने से पीछे न हटें। लंबी और जटिल प्रक्रिया से अच्छे उम्मीदवारों का मन बदल सकता है। सरकार को जरूरी जानकारी देना ठीक है, लेकिन इससे नियुक्तियों में देरी नहीं होनी चाहिए।
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर: जस्टिस कौल ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने पर चिंता जताई। भारत में कई बार दोष साबित होने से पहले लंबे समय तक जेल में रहना ही सजा बन जाता है।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की कथित साजिश में शामिल होने का आरोप है। इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी। दोनों के खिलाफ UAPA के तहत मामला दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को और दिल्ली हाईकोर्ट ने सितंबर में उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
कोर्ट और राजनीतिक लड़ाई पर: कोर्ट का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए नहीं होना चाहिए। राजनीतिक मुद्दे दूसरे मंचों पर उठाए जाने चाहिए, लेकिन कानूनी सवालों पर अदालत सुनवाई कर सकती है। कोर्ट का काम संविधान की रक्षा करना और सरकार के कामकाज पर नजर रखना है, न कि विपक्ष के हथियार के रूप में काम करना।
उनका यह बयान चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया के खिलाफ विपक्ष की याचिका के बीच आया। INDIA गठबंधन के नेताओं ने SIR को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में संवैधानिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।

