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अमेरिका के प्रोफेसर ने जीएलए में बताया शोध और शिक्षा का भविष्य

  • पांच दिवसीय एफडीपी के दौरान जीएलए के सभी विभागों और छात्रों से रूबरू हुए अमेरिकी प्रोफेसर

दैनिक उजाला, मथुरा: जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा में आयोजित पांच दिवसीय फैकल्टी एनेबलमेंट प्रोग्राम के दौरान पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के प्रतिष्ठित प्रोफेसर प्रो. अखलेश लखटकिया ने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान उसके गुणवत्तापूर्ण शोध, ईमानदार कार्य संस्कृति और वैश्विक सोच से बनती है। उन्होंने कहा कि शोध केवल डिग्री या प्रकाशन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य समाज और उद्योग की वास्तविक समस्याओं का समाधान होना चाहिए।

प्रो. लखटकिया ने अपने व्याख्यानों में बताया कि गुणवत्तापूर्ण शोध क्यों जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब शोध ईमानदारी, स्पष्ट उद्देश्य और सही पद्धति के साथ किया जाता है, तभी वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किया जाता है। शोध में नैतिकता, डेटा की विश्वसनीयता और जिम्मेदार प्रकाशन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही शोध की विश्वसनीयता तय करती है।

शोध प्रस्ताव में उद्देश्य साफ और सरल शब्दों में लिखे जाएं

उन्होंने रिसर्च इंटीग्रिटी, एथिकल पब्लिकेशन, प्लेगरिज्म से बचाव और लेखकीय जिम्मेदारी जैसे विषयों को सरल शब्दों में समझाया। प्रो. लखटकिया ने कहा कि आज दुनिया उन्हीं संस्थानों को महत्व देती है, जहां शोध पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ किया जाता है। कार्यक्रम के दौरान प्रो. लखटकिया ने अंतरराष्ट्रीय अनुदान और ग्रांट लेखन पर भी व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया। उन्होंने बताया कि शोध विषय ऐसा चुना जाना चाहिए जो समाज या उद्योग की वास्तविक जरूरत से जुड़ा हो। शोध प्रस्ताव में उद्देश्य साफ और सरल शब्दों में लिखे जाएं, ताकि उन्हें आसानी से समझा जा सके।
उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि शोध से भविष्य में क्या लाभ होगा और किसे उसका फायदा मिलेगा। इसके साथ ही उन्होंने टीम के रूप में काम करने, अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों को साथ जोड़ने, फंडिंग एजेंसियों के दिशा-निर्देशों को ध्यान से पढ़ने और समय पर आवेदन करने जैसे सरल तरीकों पर भी जोर दिया, जिससे वैश्विक फंडिंग एजेंसियों से जुड़ना आसान हो सके।

प्रयोगशाला से निकलकर समाज तक पहुंचें
प्रो. लखटकिया ने कहा कि भविष्य की शिक्षा और शोध का रास्ता इंडस्ट्री अकादमिक सहयोग और ट्रांसलेशनल रिसर्च यानि (अनुवादात्मक अनुसंधान) से होकर जाता है। विश्वविद्यालयों को उद्योग के साथ मिलकर ऐसे शोध करने चाहिए, जो प्रयोगशाला से निकलकर समाज तक पहुंचें। इससे छात्रों को व्यावहारिक अनुभव मिलता है और शोध को नई दिशा मिलती है।

कार्यक्रम को अधिक प्रेरणादायक बनाने के लिए एक विशेष सत्र में जुमांजी सहित कई प्रेरक फिल्मों पर भी चर्चा की गई। अमेरिकी प्रो. लखटकिया ने बताया कि ऐसी फिल्में टीमवर्क, नेतृत्व, धैर्य, लक्ष्य निर्धारण और चुनौतियों से सीखने की भावना को मजबूत करती हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की फिल्में न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि भविष्य की सोच को दिशा देती हैं और जीवन की रूपरेखा तय करने में भी मदद करती हैं।

भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि फैकल्टी एक्सचेंज प्रोग्राम, स्टूडेंट मोबिलिटी, संयुक्त शोध परियोजनाएं और दीर्घकालिक एमओयू किसी भी संस्थान को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाते हैं। उन्होंने जीएलए विश्वविद्यालय द्वारा अमेरिका और अन्य देशों के संस्थानों के साथ मिलकर मिक्स्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स, फैकल्टी एक्सचेंज और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की।
इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों द्वारा कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें शिक्षकों और प्रोफेसरों ने अपनी तकनीकी दक्षता, नवाचार और शिक्षण पद्धतियों का प्रदर्शन किया। इन सत्रों ने शिक्षण और शोध को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जीएलए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की दिशा में प्रयासरत

कार्यक्रम में कुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता ने कहा कि जीएलए विश्वविद्यालय निरंतर शोध संस्कृति को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहा है। डीन एकेडमिक प्रो. आशीष शर्मा ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों, चल रही शोध गतिविधियों और भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी।

सीईओ नीरज अग्रवाल और सीएफओ डॉ. विवेक अग्रवाल ने कहा कि ऐसे फैकल्टी एनेबलमेंट प्रोग्राम फैकल्टी और छात्रों को वैश्विक मानकों से जोड़ते हैं और विश्वविद्यालय को नई ऊंचाइयों तक ले जाते हैं।

बायोटेक विभाग की प्रोफेसर डा. रूही सिक्का ने पांच दिनों तक चले इस फैकल्टी एनेबलमेंट प्रोग्राम कार्यक्रम का संचालन किया तथा उन्होंने बताया कि जीएलए विश्वविद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शोध, नवाचार और भविष्य-केंद्रित सोच को मजबूत किया। कुल मिलाकर यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और शोध वातावरण को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।

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