- कड़ाके की सर्दी में एक मां ने अपने बलिदान बेटे गुरनाम सिंह की प्रतिमा को कंबल ओढ़ाया, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है
आरएसपुरा : मां तो फिर मां होती है…भला इस कड़ाके की सर्दी में अपने लाडले को ठंड कैसे लगने देती। यह बूढ़ी मां कैसे रजाई ओढ़कर घर में सो सकती थी। वह घर से निकली और आरएसपुरा के रठाना मोड़ (गुरनाम सिंह चौक) में अपने बलिदानी बेटे की प्रतिमा के पास पहुंची। आंखों से आंसू बहते रहे और हाथों में कंबल था।
मां ने प्रतिमा को लाड-दुलार कर कंबल ओढ़ाया। और बोलीं….इस समय इतनी सर्दी में सभी लोग अपने-अपने घरों में हीटर लगाकर बैठे हैं, ऐसे में मेरा बेटा कैसे ठंड में खड़ा रहेगा? मां हूं, दिल कैसे मान जाए। यह दृश्य केवल एक स्मृति नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि बलिदानी कभी मरते नहीं। मां की ममता आज भी बेटे के साथ खड़ी है और गुरनाम सिंह का बलिदान देश की सीमाओं पर एक मजबूत पहरेदार की तरह अमर है।
2016 में हुए थे बलिदान
22 अक्तूबर, 2016 को सांबा सेक्टर की अग्रिम सुरक्षा चौकी बोबियां में आतंकियों से लोहा लेते हुए बीएसएफ के सिपाही 24 वर्षीय गुरनाम सिंह मातृभूमि की रक्षा करते हुए बलिदान हो गए थे। गुरनाम की बहादुरी को सलाम करते हुए चौक में उनकी प्रतिमा बनाई गई है।
सिपाही गुरनाम सिंह के लिए उनकी मां जसवंत कौर आज भी उतनी ही फिक्र करती हैं, जो हर मां अपने बेटे के लिए करती है। शुक्रवार को प्रतिमा के पास खड़ी जसवंत कौर ने बीते दिनों को याद करते हुए बताया कि गुरनाम सिंह को बचपन से ही ठंड बहुत लगती थी और उसे कंबल ओढ़ने का भी बहुत शौक था। वह अक्टूबर में ही रजाई निकलवा लेता था। ड्यूटी पर होने के दौरान भी घर में फोन कर मुझसे गर्म कपड़े व कंबल मंगवा लेता था।
पिता बोले-आज हमारे पास खाने को भी कुछ नहीं
बलिदानी के पिता कुलबीर सिंह चुपचाप खड़े होकर बेटे की प्रतिमा को निहारते रहे। उनकी खामोशी में पिता का गर्व और टूटे दिल का दर्द दोनों साफ झलक रहे थे। इसके साथ बलिदानी की मां और पिता का दर्द भी झलक पड़ा।
मां जसवंत कौर ने कहा कि जिस चौक में प्रतिमा लगी है वह काफी छोटा है। कई बार जब वहां से गाड़ी गुजरती है तो स्मारक को ठोकर लगती है, तब मेरा कलेजा फट पड़ता है। चौक बड़ा किया जाना चाहिए।
वहीं पिता कुलबीर ने कहा कि जब गुरनाम बलिदान हुआ तो हमसे कई वादे किए गए थे। मेरी बेटी को तो बीएसएफ ने नौकरी दी, अब उसकी शादी हो चुकी है। लेकिन जम्मू-कश्मीर सरकार ने कुछ नहीं दिया। पांच लाख रुपये देने का वादा किया गया था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ। हमारे पास न खेतीबाड़ी है और न आज खाने के लिए कुछ है। बहुत मुश्किल से जीवन गुजार रहे हैं। उन्होंने भाजपा विधायक विक्रम रंधावा का धन्यवाद करते हुए कहा कि उन्होंने ही चौक में बेटे की प्रतिमा बनवाकर दी थी।
‘आवाज आज भी कानों में गूंजती है’
मां ने कहा कि आज भी वही आवाज कानों में गूंजती है। बेटे के बलिदान होने का जिक्र करते हुए मां की आंखें बार-बार भर आती थीं। आंसुओं के बीच उन्होंने कहा कि बेटे को खोने का दर्द कभी कम नहीं हुआ, लेकिन इस बात का गर्व जरूर है कि उसने देश के लिए अपने प्राण दिए।
तेरा शेर नहीं डरेगा…
जसवंत कौर ने बताया कि गुरनाम ने बलिदान होने से पहले घर फोन कर बताया कि मैंने आतंकियों को मार गिराया है और उसे वीरता का पुरस्कार भी मां जसवंत कौर मिला है। अपना ख्याल रखने को कहने पर वह बोलता था… तेरा शेर नहीं डरेगा। वह कई बार कहता था कि अगर मैं बलिदान हो गया तो गांव के चौक में मेरी प्रतिमा बनवाना, जिसे दुनिया देखेगी। इस चौका का नाम गुरनाम सिंह चौक रखना। मेरी बंदूक मेरी प्रतिमा के साथ होनी चाहिए और मेरी बहन उसे हर साल राखी भी बांधे। जसवंत कौर ने कहा कि हम ऐसा ही करते हैं।

