यमुनानगर के औरंगाबाद में रविवार को भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) की ओर से आयोजित किसान महापंचायत में किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर सरकार पर जमकर निशाना साधा गया। महापंचायत में किसान नेता राकेश टिकैत ट्रैक्टर पर पहुंचे और धान खरीद में आ रही परेशानियों, किसानों की फसल, गन्ने के रेट और सरकार की नीतियों को लेकर अपनी बात रखी।
महापंचायत के दौरान भाकियू प्रदेशाध्यक्ष रतन मान ने यमुनानगर में हाईवे जाम करने का ऐलान किया। घोषणा के बाद किसान हाईवे की ओर बढ़े और पंचकुला-सहारनपुर हाईवे पर धरने पर बैठ गए। किसान नेताओं का कहना है कि अधिकारी उनसे उनकी मांगों का ज्ञापन लेने के लिए हाईवे पर ही आएं।
सरकार की नीतियों के कारण खेती से दूर हो रहा युवा
राकेश टिकैत ने कहा कि धान की खरीद प्रक्रिया अभी भी सही तरीके से शुरू नहीं हुई है। किसानों को खरीद के नाम पर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ये वही किसान हैं, जिन्होंने 13 महीने तक दिल्ली को घेरकर रखा था। टिकैत ने कहा कि सरकार की खराब नीतियों के कारण युवा खेती से दूर हो रहा है।
टिकैत ने कहा कि हरियाणा के किसान जो भी निर्णय लेंगे, भारतीय किसान यूनियन उनके साथ खड़ी रहेगी। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो हरियाणा-उत्तर प्रदेश बॉर्डर को सील करने का फैसला भी लिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि किसान कमेटी के निर्णय के साथ हैं और देशभर में किसानों के साथ अत्याचार हो रहा है। टिकैत ने कहा कि किसान ही देश को बचाएगा।
उन्होंने कहा कि पहले उत्तर प्रदेश के किसान भी अपनी फसल हरियाणा में बेचने के लिए आते थे, लेकिन अब हरियाणा का किसान ही परेशान है। उन्होंने किसानों की फसल की खरीद सुचारु तरीके से कराने और उन्हें मंडियों में अनावश्यक परेशानी से बचाने की मांग की।
रतन मान बोले- न फसल खरीदी जा रही, न गन्ने का दाम मिल रहा
भाकियू प्रदेशाध्यक्ष रतन मान ने कहा कि हरियाणा में किसानों की कई समस्याएं हैं। उनके अनुसार, किसानों की फसल की खरीद को लेकर दिक्कतें बनी हुई हैं और गन्ने के दाम को लेकर भी किसानों में रोष है। उन्होंने कहा कि किसानों को अपनी मांगों के लिए बार-बार आंदोलन करने पड़ रहे हैं।
रतन मान ने कहा कि धान की खरीद शुरू होने की बात कही जा रही है, लेकिन मंडियों में अभी तक पर्याप्त बारदाना नहीं पहुंचा है। इससे किसानों को परेशानी हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही और खेती-किसानी को कमजोर करने वाली नीतियां अपनाई जा रही हैं।

