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थाने जाने का झंझट खत्म, मोबाइल से करें e-FIR:कोर्ट-इंश्योरेंस में भी मान्य, सिर्फ इन मामलों में जाना होगा पुलिस स्टेशन

लखनऊ : क्या आपका मोबाइल चोरी हो गया? बाइक गायब हो गई? या किसी ऑनलाइन ठग ने बैंक खाते से पैसे उड़ा लिए? ऐसी छोटी-मोटी शिकायतों के लिए अब थाने जाने की जरूरत नहीं। आप घर बैठे अपने मोबाइल या कंप्यूटर से ऑनलाइन एफआईआर (e-FIR) दर्ज कर सकते हैं।

इन मामलों में घर बैठे होगी ऑनलाइन FIR

यूपी पुलिस के नियमों के मुताबिक, आप ऐसे मामलों में ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करा सकते हैं, जहां आरोपी अज्ञात हो और कोई गंभीर शारीरिक हिंसा न हुई हो। जैसे- आपकी कार, बाइक, स्कूटर, साइकिल या अन्य कोई गाड़ी चोरी हो गई हो।

बाजार, बस, ट्रेन या कहीं से भी आपका मोबाइल फोन, लैपटॉप या टैबलेट चोरी हो जाए। आपका आधार कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट, स्कूल-कॉलेज की मार्कशीट या ड्राइविंग लाइसेंस खो जाए।

आपके घर या दुकान का किसी ने ताला तोड़ दिया हो, लेकिन आपको पता न हो कि ऐसा किसने किया। आपके बैंक खाते से ऑनलाइन पैसे कट गए हों। फेसबुक-इंस्टाग्राम अकाउंट हैक हो गया हो या कोई इंटरनेट पर ब्लैकमेल कर रहा हो।

ऑनलाइन FIR ‘कोर्ट-इंश्योरेंस’ दोनों जगह मान्य

कई लोगों के मन में यह भ्रम होता है कि जब तक थाने की मुहर और दरोगा के सिग्नेचर नहीं होंगे, तब तक कागज सरकारी नहीं माना जाएगा। लेकिन, ऐसा नहीं है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत, डिजिटल रूप से प्रमाणित और जनरेट की गई ई-एफआईआर को सामान्य एफआईआर के बराबर ही कानूनी दर्जा प्राप्त है।

अगर आपकी गाड़ी चोरी हुई है, तो इंश्योरेंस कंपनी से क्लेम पास कराने के लिए यह ऑनलाइन कॉपी मान्य होगी। सिम कार्ड-पासपोर्ट खोने पर उसे दोबारा जारी करवाने के लिए भी यह कानूनी रूप से स्वीकार्य है।

ऑनलाइन FIR की सुनवाई न हो, तब क्या करें?

अगर स्थानीय पुलिस आपकी वैध शिकायत पर कार्रवाई करने से आनाकानी करती है, तो देश का कानून आपको 3 मजबूत रास्ते देता है।

SP या SSP से गुहार लगाएं: आप अपनी शिकायत को लिखित रूप में जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) या वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को पोस्ट/स्पीड पोस्ट से भेज सकते हैं। आप उनसे सीधे उनके ऑफिस में जाकर मिल भी सकते हैं।

जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत करें: आप यूपी सरकार के जनसुनवाई पोर्टल jansunwai.up.nic.in पर जाकर पुलिस विभाग के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इस पोर्टल की निगरानी सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से की जाती है। इसलिए स्थानीय पुलिस को तय समय में जवाब देना ही पड़ता है।

कोर्ट जाने का ऑप्शन भी है: इसके बाद भी अगर सुनवाई न हो, तो आप वकील के जरिए क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट की अदालत में BNSS की धारा 156(3) के तहत आवेदन कर सकते हैं। अगर कोर्ट को लगता है कि मामला जांच के योग्य है, तो वह पुलिस को फटकार लगाते हुए तुरंत एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई का आदेश जारी कर देता है।

ऑनलाइन दर्ज होने वाली ये शिकायत NCR की कैटेगरी में आती है। इसका फर्क भी समझ लेते हैं-

NCR का मतलब नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट है। यह कम गंभीर मामलों में दर्ज की जाती है। जैसे- आपसी गाली-गलौज, मामूली मारपीट, मोबाइल या पर्स गुम होना, बाइक चोरी। ऐसे मामलों में पुलिस सीधे जांच या गिरफ्तारी नहीं कर सकती। जांच शुरू करने के लिए पहले मजिस्ट्रेट (कोर्ट) की अनुमति जरूरी होती है।

FIR का मतलब फर्स्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट है। यह गंभीर या कानूनी कार्रवाई लायक अपराधों में दर्ज होती है। जैसे- लूट, साइबर फ्रॉड, हत्या या डकैती। FIR दर्ज होते ही पुलिस कोर्ट की अनुमति बिना ही जांच शुरू कर सकती है। जरूरत पड़ने पर आरोपी को गिरफ्तार भी कर सकती है।

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