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जीएलए में कच्चे तेल के प्रदूषण पर होगा शोध, 13.36 लाख रुपये का अनुदान

दैनिक उजाला, मथुरा : पर्यावरण प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण शोध परियोजना के लिए उत्तर प्रदेश काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (सीएसटी-यूपी) की ओर से जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा को 13.36 लाख रुपये का शोध अनुदान स्वीकृत किया गया है। परियोजना के तहत कच्चे तेल के अवशेषों से निकलने वाले मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक प्रदूषकों के जैव-अपघटन की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा। शोध में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले बैक्टीरिया की मदद से पेट्रोलियम प्रदूषण को कम करने की संभावनाओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

इस शोध परियोजना पर जीएलए विश्वविद्यालय बायोटेक विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर एवं परियोजना की प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर डॉ. अनुजा मिश्रा रिसर्च करेंगी। साथ ही एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. स्वरूप कुमार पांडेय को-इन्वेस्टिगेटर के रूप में सहयोग करेंगे। शोध परियोजना का विषय “कच्चे तेल के अवशेष से पृथक किए गए बैक्टीरिया की सहायता से मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) के जैव-अपघटन की क्षमता का अध्ययन” है।

कच्चे तेल तथा पेट्रोलियम उद्योग से निकलने वाले अवशेषों में पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) जैसे जटिल और हानिकारक प्रदूषक पाए जाते हैं। ये पदार्थ पर्यावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं और मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। ऐसे प्रदूषकों को कम करने के लिए प्रभावी, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।

शोध परियोजना के अंतर्गत कच्चे तेल के अवशेषों से ऐसे विशिष्ट सूक्ष्मजीवों और बैक्टीरिया की पहचान एवं अध्ययन किया जाएगा, जो पीएएच जैसे जटिल प्रदूषकों को प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया के माध्यम से तोड़ने में सक्षम हो सकते हैं। शोध के दौरान इन बैक्टीरिया की जैव-अपघटन क्षमता, संबंधित जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं तथा पीएएच के विघटन की संभावनाओं का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।

परियोजना की विशेषता यह है कि इसमें प्रदूषित पर्यावरण के उपचार के लिए सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक क्षमता का उपयोग किया जाएगा। इससे भविष्य में पेट्रोलियम प्रदूषित मिट्टी और अन्य पर्यावरणीय स्थलों के उपचार के लिए अधिक सुरक्षित, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बायोरिमेडिएशन तकनीक विकसित करने में सहायता मिल सकती है।

शोध परियोजना के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जैव प्रौद्योगिकी और मानव स्वास्थ्य के बीच एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कड़ी स्थापित करने का प्रयास किया जाएगा। परियोजना से प्राप्त परिणाम भविष्य में पेट्रोलियम प्रदूषकों के जैव-अपघटन के लिए प्रभावी सूक्ष्मजीवों की पहचान और उनके व्यावहारिक उपयोग की संभावनाओं को मजबूत कर सकते हैं।

शोध अनुदान स्वीकृत होने पर डॉ. अनुजा मिश्रा और डॉ. स्वरूप कुमार पांडेय ने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता, कुलसचिव अशोक कुमार सिंह, डीन रिसर्च प्रो. कमल शर्मा तथा डीन एकेडमिक्स प्रो. आशीष शर्मा के प्रति आभार व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के शीर्ष नेतृत्व और अकादमिक प्रशासन से प्राप्त निरंतर प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सहयोग ने शोध एवं नवाचार को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्वविद्यालय की ओर से शोधकर्ताओं को उपलब्ध कराया जा रहा सकारात्मक अकादमिक वातावरण उन्हें उत्कृष्ट, नवाचारपरक और समाजोपयोगी अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है।

सीएसटी-यूपी से प्राप्त 13.36 लाख रुपये का यह शोध अनुदान जीएलए विश्वविद्यालय में पर्यावरणीय जैव प्रौद्योगिकी, बायोरिमेडिएशन और वन हेल्थ जैसे उभरते क्षेत्रों में अनुसंधान को मजबूती प्रदान करेगा। परियोजना के सफल परिणाम भविष्य में पेट्रोलियम प्रदूषित क्षेत्रों के जैविक उपचार, पर्यावरणीय पुनर्स्थापना और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

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