- जीएलए में ओबीई पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन
दैनिक उजाला, मथुरा : भारतीय उच्च शिक्षा व्यवस्था एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रही है, जहां पारंपरिक शिक्षण पद्धतियों की जगह परिणाम-आधारित और कौशल-केंद्रित मॉडल तेजी से उभर रहे हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में जीएलए विश्वविद्यालय ने शैक्षणिक गुणवत्ता और शोध के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका को और मजबूत करते हुए ‘परिणाम आधारित शिक्षा (ओबीई) और सामाजिक विज्ञान शोध’ विषय पर विश्वविद्यालय के परीक्षा प्रकोष्ठ और डीन एकेडमिक अफेयर्स कार्यालय के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के सहयोग से दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया।
कार्यशाला का उद्देश्य केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि शिक्षण, अधिगम और मूल्यांकन की प्रक्रियाओं को वैश्विक मानकों के अनुरूप ढालने पर केंद्रित रहा। उद्घाटन सत्र में बतौर विशिष्ट अतिथि डॉ. हरिवंश चतुर्वेदी (डायरेक्टर जनरल-आईआईएलएम) ने शिक्षा के व्यापक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 21वीं सदी की चुनौतियों के लिए पारंपरिक सोच पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा आज की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक और समालोचनात्मक सोच विकसित करे, ताकि वे जटिल सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को समझकर समाधान खोज सकें।
जीएलए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अनूप कुमार गुप्ता ने परिणाम आधारित शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा कि यह मॉडल शिक्षा को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाता है। उन्होंने कहा कि यह मॉडल न केवल विद्यार्थियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करता है, बल्कि संस्थानों को भी गुणवत्ता के स्पष्ट मानक अपनाने के लिए प्रेरित करता है।
तकनीकी सत्रों में शिक्षण प्रक्रिया के व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। प्रो. सचिन कुमार मंगला (डीन-रिसर्च, फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट) ने शिक्षा को समाज और उद्योग से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि परिणाम आधारित शिक्षा तभी सफल मानी जाएगी, जब वह विद्यार्थियों में जिम्मेदारी और व्यवहारिक समझ विकसित करे। उन्होंने कहा कि शिक्षा को कक्षा से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन की जरूरतों से जोड़ना आवश्यक है।
प्रो. शालिनी श्रीवास्तव (जयपुरिया इंस्टिट्यूट) ने प्रोग्राम और कोर्स आउटकम्स के स्पष्ट निर्धारण पर जोर देते हुए बताया कि जब सीखने के लक्ष्य स्पष्ट होते हैं, तो पूरी शिक्षण प्रक्रिया अधिक उद्देश्यपूर्ण और प्रभावी बन जाती है। उन्होंने इस बात पर विशेष ध्यान दिलाया कि शिक्षा का केंद्र बिंदु शिक्षक नहीं, बल्कि विद्यार्थी की वास्तविक सीख होनी चाहिए।
इसी क्रम में कार्यशाला के एक महत्वपूर्ण हिस्से में मूल्यांकन प्रणाली पर गहन चर्चा हुई। परीक्षा नियंत्रक प्रो. अतुल बंसल ने कहा कि पारंपरिक परीक्षा प्रणाली को बदलकर उसे सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाना होगा। उन्होंने उदाहरणों संग समझाया कि मूल्यांकन का उद्देश्य केवल अंक देना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को यह समझने में मदद करना होना चाहिए कि उन्हें कहाँ सुधार की जरूरत है।
एसोसिएट डीन प्रो. आशीष शुक्ला ने कक्षा में सक्रिय भागीदारी के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि प्रभावी शिक्षण तभी संभव है, जब विद्यार्थी केवल श्रोता न रहकर संवाद का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि सीखने का वातावरण जितना खुला और सहभागितापूर्ण होगा, परिणाम उतने ही बेहतर होंगे।
समापन सत्र में डीन ऐकडेमिक प्रो. आशीष शर्मा ने परिणाम आधारित शिक्षा के व्यापक प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रणाली विद्यार्थियों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि जीवन और पेशेवर चुनौतियों के लिए तैयार करती है। उन्होंने इस प्रकार की पहल को उच्च शिक्षा में गुणवत्ता और नवाचार को बढ़ावा देने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया।
कार्यशाला के अंत में प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। कार्यशाला समन्वयक डॉ. सुचेता अग्रवाल, सह-समन्वयक डॉ. जितेंद्र कुमार दीक्षित, डॉ. विवेक अग्रवाल, डॉ. शिवम् भारद्वाज, डॉ. नीरज पाठक ने विभिन्न व्यवस्थाओं को संभाला।

