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सावन मास का आखिरी दिन; रक्षाबंधन पर दाऊजी महाराज के स्वर्ण जड़ित हिंडोले के दर्शन को उमड़े श्रद्धालु

  • शाम को पट खुलते ही दर्शन को उमड़ा आस्था का सैलाब

दैनिक उजाला, बलदेव/मथुरा : सावन मास के आखिरी दिन रक्षाबंधन के पर्व पर शाम को श्री दाऊजी महाराज व माता रेवती के दर्शन को श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। अवसर था स्वर्ण जड़ित हिंडोले के दर्शन का।

सावन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी की बात ही निराली है, जिसमें कोयल की मीठी कूक, मोर का नृत्य पूरे वेग से बहती यमुना मन को आनंदित कर देती है। ब्रज मंडल में ब्रज के राजा ठाकुर श्रीदाऊजी महाराज के मंदिर में हिंडोला उत्सव की झांकियां भक्तों को प्रेम संदेश प्रदान करती हैं। भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलदाऊजी महाराज जिन्हें श्रद्धालु प्रेमवश दाऊजी कहते हैं के झूलना उत्सव की बात ही निराली है। श्रावण मास की एकादशी से रक्षाबंधन तक ठाकुर दाऊजी महाराज के स्वरूप को दर्पण के माध्यम से हिंडोले में झूलाकर परंपरा निर्वहन किया जाता है।

दर्पण के दर्शन को उमड़ा सैलाब

रक्षाबंधन के अवसर पर हिंडोले में आरती से पहले दर्पण के दर्शन को श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। राधे झूलन पधारो, झुक आये बदरा… जैसे सुरमयी आवाजों से दाऊजी मंदिर प्रांगण गूंजने लगा तो श्रद्धालु आनंदित हो उठे।

विशाल विग्रह को झुलाना असंभव

मंदिर सेवायत बलदेव विकास समिति के अध्यक्ष ज्ञानेंद्र पांडेय ने बताया कि दाऊजी महाराज का विशाल व अत्यन्त मनोहारी विग्रह लगभग आठ फुट उंचा और करीब साढे तीन फुट चौड़ा है। दाऊजी महाराज के विशाल विग्रह पर सात नाग भी हैं। विशाल विग्रह को झूला-झुलाना असंभव है। ऐसे में श्रीदाऊजी महाराज के विग्रह के ठीक सामने जगमोहन प्रांगण में हिण्डोला स्थापित किया जाता है। लगभग पंद्रह फुट ऊंचे हिण्डोले में ठाकुर श्रीदाऊजी महाराज को उनके स्वर्ण जडित दर्पण के माध्यम से झूला-झुलाया जाता है। आरती से पूर्व दर्पण में उनकी छवि को झुलाया जाता है। आरती के पश्चात उनके मुकुट और मुरली को हिण्डोले में रखा जाता है, जिसमें ठाकुर बलदेवजी की छवि दिखाई देती है।

अनूठी है समाज गायन की परंपरा

सावन मास में दाऊजी महाराज के झूला-झूलने के साथ-साथ समाज गायन की अनूठी परंपरा है। पण्डा समाज के लोग एकजुट होकर झांझ-मजीरा बजाकर श्रीदाऊजी और माता रेवती की समाज गायन करते हैं। इस अवसर पर झांझ-मजीरा की धुन को सुनकर दर्शक भी भाव-विभोर हो उठते हैं, जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु की भीड लग जाती है।

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