मथुरा : मथुरा में शनिवार को हरियाली तीज मनाई जा रही है। वृंदावन में बांके बिहारी के दर्शन के लिए मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भीड़ है। यहां की गलियां भक्तों से खचाखच भरी हुई हैं। हर तरफ भक्त ही भक्त नजर आ रहे हैं।
सुबह करीब 8 बजे मंदिर का पट खुला। जैसे ही उन्होंने 10 किलो सोने और 1000 किलो चांदी से बने झूले में हरे रंग की बेशकीमती जड़ाऊ पोशाक में विराजमान बांके बिहारी को देखा। वे भाव विभोर हो गए। हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर आशीर्वाद लिया। जयकारे भी लगाए।
इस समय भगवान को भोग लगाने की तैयारी चल रही है। उन्हें घेवर और फैनी का भोग लगाया जाएगा। अभी तक 50 हजार से अधिक भक्त बांके बिहारी के दर्शन कर चुके हैं।
प्रशासन का अनुमान है कि आज दिनभर 8 लाख से ज्यादा श्रद्धालु मथुरा आ सकते हैं। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए बांके बिहारी मंदिर से 3 किलोमीटर पहले ही गाड़ियां रोकी जा रही हैं।
वहां से ई-रिक्शा और ई-कार्ट की व्यवस्था की गई है। हालांकि, श्रद्धालुओं की संख्या ज्यादा होने से बहुत लोगों को तीन किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर पहुंचना पड़ रहा है।
शाम को दक्षिण भारतीय शैली के रंगनाथ मंदिर में भगवान गोदा रंगमन्नार चांदी के झूले में विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे। बांके बिहारी मंदिर में हरियाली तीज पर साल में एक बार झूला डाला जाता है।
यहां भगवान बांके बिहारी गर्भगृह से निकलकर आंगन में लगे झूले में विराजमान होते हैं। भगवान बांके बिहारी पहली बार इस झूले में 19 अगस्त 1947 को विराजे थे। जबकि इस झूले को बनवाकर 15 अगस्त 1947 को भगवान को अर्पित किया था।
3 किमी पहले पार्किंग, यहां से पैदल मंदिर जाना पड़ रहा
शहर में वाहनों की एंट्री के सभी रास्ते बंद कर ट्रैफिक का रूट बदला गया है। मंदिर से करीब 3 किमी दूर अलग-अलग एरिया में 21 से ज्यादा पार्किंग बनाई गई हैं। यहां बाहर से आने वाले वाहनों को रोक दिया जा रहा। इसके बाद वे ई-रिक्शा या ई-कार्ट बुक कर आ सकते हैं। किराया 20 रुपए प्रति यात्री तय है।
ई-रिक्शा या ई-कार्ट न मिलने पर 3 किमी श्रद्धालुओं को पैदल चलना पड़ रहा। ट्रैफिक पुलिस का कहना है कि भीड़ जैसे ज्यादा बढ़ेगी, ई-रिक्शा और ई-कार्ट भी रोक दिए जाएंगे।
मंदिर के आस-पास की सभी गलियों में बैरिकेडिंग लगाकर लाइन से मंदिर में प्रवेश कराया जा रहा है। वृंदावन को 4 जोन और 18 सेक्टर में बांटा गया है। 1 हजार से ज्यादा पुलिस कर्मियों की ड्यूटी लगाई है। भीड़ और यातायात व्यवस्था के लिए 69 बैरियर लगाए गए हैं।
बांके बिहारी ने हरियाली पोशाक धारण की
आज बांके बिहारी जी को हरे रंग की बेशकीमती जड़ाऊ पोषाक और रत्न जड़ित सोने के आभूषण धारण कराए गए हैं। इसके अलावा मावा, मलाई, मक्खन, सादा मीठा घेवर, फीकी, मीठी रसीली, केसरिया फैनी का विशेष भोग अर्पित किया जाना है।
इस विशेष पर्व पर ठाकुरजी के विश्राम के लिए सोने-चांदी से बना शयन शैया सजाया गया है। जिसे सुख सेज कहा जाता है। भगवान बाल स्वरूप में होने के कारण ज्यादा देर तक खड़े रहने के चलते थक जाते हैं। उनको आराम देने के लिए यह सुख सेज लगाई जाती है। उसके पास चांदी का आइना सहित श्रृंगार की सभी सामग्री (सुहाग पिटारी) रखी गई है।
भाव के अनुसार, झूला विहार के बाद बांके बिहारी जी इसी शैया पर शयन करते हैं, फिर उठकर सजते संवरते हैं। इसीलिए इस शयन शैया पर सुहाग पिटारी चढ़ाने का विशेष महत्व है।
कब और कैसे झूला बनकर तैयार हुआ

भगवान बांके बिहारी 10 किलो सोने और 1000 किलो चांदी से बने इसी झूले में विराजमान हुए हैं।
- इतिहासकार और बांके बिहारी मंदिर के पुजारी प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी ने बताया- बांके बिहारी मंदिर में 80 साल पहले तक पेड़ों की टहनियां लगाकर सुगंधित पुष्पों की कोमल कलियों और केला, वंदनवार वगैरह से प्राकृतिक हिंढोला यानी झूला सजाया जाता था।
- समय बदला और प्रभु की इच्छा, भक्तों की भावना से वर्तमान दिव्य झूले को बनाया गया। बांके बिहारी जी का ये सोने-चांदी से बना झूला ब्रज ही नहीं, बल्कि विश्व में अपनी तरह का एकमात्र झूला है। सौंदर्य, आकर्षक और भव्यता को लेकर ये विश्व में विख्यात है।
- गोस्वामी कहते हैं- इसका इतिहास भी बहुत जरूरी है। 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन के समय बांके बिहारी जी के झूले का निर्माण बनारस के कारीगर छोटेलाल और ललन भाई के निर्देशन में 20 कारीगरों द्वारा 5 साल की मेहनत के बाद हो पाया था। झूला बनाने में एक लाख तोला यानी 1000 किलो चांदी और एक हजार तोला यानी 10 किलो सोना, शीशम, साल और सागवान की लकड़ी का उपयोग हुआ।
- इन लकड़ियों के लिए नेपाल में टनकपुर के जंगल की लकड़ी का सौदा कई वर्षों की लीज पर किया गया था। इसके निर्माण में सेवायत समाज, भक्त और बेरीबाला परिवार ने तन, मन, धन से सहयोग प्रदान किया था।
- झूला बनने के बाद पहली बार 15 अगस्त 1947 यानी जिस दिन देश आजादी का जश्न मना रहा था, उस दिन इस झूले को भगवान बांके बिहारी जी को समर्पित किया गया और 4 दिन बाद 19 अगस्त को पहली बार इस झूले में बांके बिहारी विराजमान हुए।
- प्रह्लाद बल्लभ गोस्वामी के मुताबिक, साल 1947 में सावन अधिक माह होने के चलते दो महीने तक चला था। 15 अगस्त 1947 को जिस दिन भारत को आजादी मिली थी, उसी दिन ये झूला ठाकुरजी की सेवा में समर्पित किया गया था। करीब 125 अलग-अलग हिस्सों में बना अपने आप में अनूठा यह फोल्डिंग झूला नक्काशी कला का बेजोड़ प्रमाण है।
- नाचते मयूर, टेड़े-मेढे खंभे, घुमावदार सीढ़ियां और ललिता, विशाखा, चित्रलेखा, रंगदेवी नाम की सखियों की आदमकद मूर्तियां सहित उकेरे गए वेल बूंटों की कलात्मकता भावुक भक्तों को आकर्षित करतीं हैं। उस वक्त इसे बनाने में लगभग 25 लाख रुपए खर्च हुए थे।

